शांत युवा हिंदी
von rashad.jones483नमस्कार भक्तों, स्वागत है आपका Prathna TV की इस बेहद महत्वपूर्ण और आंखें खोल देने वाली विशेष प्रस्तुति में। आज की यह जानकारी हर सुहागन महिला, हर परिवार और हर उस व्यक्ति के लिए बहुत जरूरी मानी जा रही है जो पूरे श्रद्धा भाव से वट सावित्री व्रत करता है। क्योंकि आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसे विषय की, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन धर्म शास्त्रों और पुरानी मान्यताओं में इसे बेहद गंभीर माना गया है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर वट सावित्री व्रत किन पांच महिलाओं को भूलकर भी नहीं रखना चाहिए, वरना घर-परिवार में अशांति, क्लेश, आर्थिक संकट और रिश्तों में दरार जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। जी हां भक्तों, वट सावित्री व्रत कोई साधारण व्रत नहीं माना गया। यह वह महाव्रत है जिसे माता सावित्री ने अपने अटल संकल्प, तपस्या और पतिव्रता धर्म के बल पर सिद्ध किया था। कहते हैं कि जब यमराज स्वयं सत्यवान के प्राण लेकर जा रहे थे, तब माता सावित्री ने अपने व्रत और तप के प्रभाव से मृत्यु के देवता तक को रोक दिया था। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और परिवार की रक्षा का सबसे शक्तिशाली व्रत माना जाने लगा। लेकिन धर्म ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि हर व्रत के कुछ नियम होते हैं, कुछ मर्यादाएं होती हैं और कुछ ऐसी स्थितियां भी होती हैं, जब किसी व्यक्ति को वह व्रत नहीं करना चाहिए। आज के समय में कई लोग केवल दूसरों को देखकर व्रत रखना शुरू कर देते हैं। कोई पड़ोसन कर रही है तो हम भी कर लें, कोई रिश्तेदार कर रही है तो हम भी कर लें। लेकिन बिना नियम जाने, बिना स्थिति समझे और बिना धार्मिक मर्यादा को समझे अगर कोई भी व्रत किया जाए, तो कई बार उसका नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। यही कारण है कि पुराने समय में घर की बड़ी बुजुर्ग महिलाएं हर किसी को व्रत रखने की अनुमति नहीं देती थीं। पहले व्यक्ति की स्थिति, मन, नियम और परिस्थिति को समझा जाता था, उसके बाद ही व्रत करने की सलाह दी जाती थी। कहा जाता है कि वट सावित्री व्रत का प्रभाव बहुत तेज होता है। यह व्रत जितना शुभ फल देता है, उतना ही नियमों की अवहेलना होने पर परेशानियां भी बढ़ा सकता है। कई बार लोग समझ नहीं पाते कि अचानक घर में तनाव क्यों बढ़ गया, पति-पत्नी के बीच दूरियां क्यों आने लगीं, आर्थिक स्थिति कमजोर क्यों होने लगी या पूजा-पाठ के बाद भी मन अशांत क्यों रहने लगा। धर्म जानने वाले विद्वानों का मानना है कि कई बार इसके पीछे व्रत से जुड़ी अनदेखी और गलतियां भी कारण बनती हैं। आज की इस विशेष वीडियो में हम आपको उन पांच महिलाओं के बारे में बताएंगे जिन्हें वट सावित्री व्रत रखने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। लेकिन ध्यान रखिएगा भक्तों, यहां किसी का अपमान करना उद्देश्य नहीं है। हमारा उद्देश्य केवल धर्म ग्रंथों और पुरानी मान्यताओं के आधार पर आपको सही जानकारी देना है, ताकि कोई भी व्यक्ति अनजाने में ऐसी गलती न करे जिससे उसके जीवन में परेशानियां बढ़ जाएं। क्योंकि कई बार जानकारी का अभाव ही सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। और भक्तों, इस वीडियो में आगे जो बातें बताई जाएंगी, उनमें कुछ ऐसी बातें भी होंगी जिन्हें सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। कई बातें ऐसी हैं जो आज की नई पीढ़ी बिल्कुल नहीं जानती। लेकिन पुराने समय में इन्हीं नियमों का पालन करके महिलाएं अपने घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखती थीं। यही कारण था कि पहले घरों में धार्मिक नियमों का इतना अधिक महत्व दिया जाता था। इतना ही नहीं, वीडियो के अंत में हम आपको एक ऐसा विशेष संकेत भी बताएंगे, जिससे आप खुद पहचान सकते हैं कि वट सावित्री व्रत आपके लिए शुभ फल देने वाला है या नहीं। साथ ही हम आपको एक छोटा सा उपाय भी बताएंगे जिसे करने से व्रत के दौरान होने वाली नकारात्मकता दूर होने लगती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है। इसलिए इस वीडियो को बिल्कुल अंत तक जरूर देखिएगा, क्योंकि बीच में छोड़ी गई जानकारी आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात को अधूरा छोड़ सकती है तो चलिए भक्तों, अब बिना देर किए शुरू करते हैं आज की यह रहस्यमयी और बेहद महत्वपूर्ण जानकारी, और जानते हैं आखिर वे कौन सी पांच महिलाएं हैं जिन्हें वट सावित्री व्रत रखने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ध्यान से सुनिएगा, क्योंकि आज की यह जानकारी आपके घर-परिवार की सुख-शांति और भविष्य से जुड़ी मानी जा रही है। जो महिला व्रत को केवल दिखावे के लिए रखती है धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि वट सावित्री व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह सच्ची श्रद्धा, विश्वास और पवित्र भावना का व्रत माना जाता है। इसलिए जो महिलाएं केवल समाज को दिखाने, दूसरों से तुलना करने या लोगों की वाहवाही पाने के लिए यह व्रत रखती हैं, उनके लिए यह शुभ नहीं माना जाता। पुराने समय में गुरुजन कहते थे कि अगर मन में श्रद्धा नहीं और केवल बाहरी दिखावा है, तो पूजा का फल धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। कई महिलाएं पूरे दिन सजावट और दिखावे में लगी रहती हैं लेकिन मन में क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार भरा रहता है। ऐसी स्थिति में व्रत की शक्ति कम हो जाती है। कहा जाता है कि वट वृक्ष और माता सावित्री सच्चे मन की भावना को सबसे पहले देखते हैं। इसलिए इस व्रत में मन की पवित्रता सबसे जरूरी मानी गई है। जो महिला बार-बार अपशब्द और कटु वचन बोलती है वट सावित्री व्रत को सौभाग्य और परिवार की शांति का व्रत माना गया है। इसलिए इस दिन वाणी की शुद्धता का विशेष महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार जो महिला हर समय झगड़ा करती हो, घर में कटु वचन बोलती हो और अपने शब्दों से दूसरों का दिल दुखाती हो, उसे पहले अपनी वाणी को शांत करने का प्रयास करना चाहिए। माना जाता है कि इस व्रत के दौरान बोले गए शब्द कई गुना प्रभाव डालते हैं। अगर पूजा करने के बाद भी मन में क्रोध और मुंह से अपशब्द निकलते रहें, तो घर का वातावरण नकारात्मक होने लगता है। पुराने समय की बुजुर्ग महिलाएं कहती थीं कि जिस घर में व्रत के दिन कलह होती है, वहां पूजा का पुण्य धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसलिए इस दिन शांत रहना और मधुर वाणी बोलना बहुत जरूरी माना गया है। जो महिला पति का अपमान करती है माता सावित्री का पूरा जीवन अपने पति के सम्मान, प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि जो महिला हर समय अपने पति का अपमान करती हो, तिरस्कार करती हो या मन में आदर न रखती हो, उसे इस व्रत का वास्तविक महत्व पहले समझना चाहिए। धर्म मान्यताओं के अनुसार यह व्रत केवल रीति-रिवाज नहीं बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते में विश्वास और सम्मान का प्रतीक माना गया है। अगर बाहर पूजा हो रही हो लेकिन घर में रिश्तों में कड़वाहट भरी हो, तो व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। पुराने समय में कहा जाता था कि जहां पति-पत्नी के बीच सम्मान बना रहता है, वहीं माता सावित्री की कृपा स्थिर होती है जो महिला पूजा के नियमों का मजाक उड़ाती है कुछ लोग व्रत और पूजा को केवल पुरानी परंपरा समझकर उसका मजाक उड़ाने लगते हैं। लेकिन धर्म में कहा गया है कि जिस काम को श्रद्धा से किया जाए, उसका अपमान नहीं करना चाहिए। अगर कोई महिला स्वयं व्रत रखे और साथ ही पूजा के नियमों का मजाक उड़ाए, तो यह शुभ नहीं माना जाता। माना जाता है कि श्रद्धा के बिना किया गया धार्मिक कार्य अधूरा रह जाता है। पुराने समय में महिलाएं पूजा के दौरान पूरी गंभीरता और भक्ति रखती थीं। इसलिए कहा जाता है कि इस व्रत में हंसी-मजाक से ज्यादा मन की आस्था का महत्व होता है। जो महिला पूरे दिन नकारात्मक सोच में रहती है वट सावित्री व्रत सकारात्मक ऊर्जा और शुभ संकल्प का व्रत माना गया है। इसलिए इस दिन बार-बार डर, अशुभ बातें, रोना-धोना या नकारात्मक सोच रखना अच्छा नहीं माना जाता। धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि व्रत के दौरान मन की स्थिति बहुत प्रभाव डालती है। अगर महिला पूरे दिन चिंता, क्रोध या बुरी बातों में उलझी रहे, तो पूजा में मन नहीं लग पाता। पुराने समय में महिलाएं इस दिन भजन, कथा और पूजा में मन लगाकर सकारात्मक वातावरण बनाती थीं। माना जाता है कि जहां सकारात्मक ऊर्जा होती है, वहीं सुख और शांति का वास होता है जो महिला बुजुर्गों का अपमान करती है धर्म में माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। इसलिए जो महिला घर के बड़े-बुजुर्गों की बात का अपमान करती हो, उन्हें ताने देती हो या उनका दिल दुखाती हो, उसे पहले अपने व्यवहार को सुधारना चाहिए। माना जाता है कि बुजुर्गों का आशीर्वाद घर की सबसे बड़ी रक्षा शक्ति होता है। अगर पूजा के साथ-साथ घर के बड़ों का अपमान हो रहा हो, तो व्रत का शुभ प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। पुराने समय में महिलाएं व्रत शुरू करने से पहले बड़ों का आशीर्वाद जरूर लेती थीं। जो महिला झूठ और छल-कपट में रहती है वट सावित्री व्रत को सत्य और निष्ठा का प्रतीक माना गया है। इसलिए जो महिला हर समय झूठ बोलती हो, छल-कपट करती हो या दूसरों को धोखा देने की आदत रखती हो, उसके लिए यह व्रत शुभ फल देने में बाधा बन सकता है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पूजा तभी सफल मानी जाती है जब मन और कर्म दोनों सच्चे हों। अगर बाहर से पूजा हो और भीतर छल भरा हो, तो आध्यात्मिक शक्ति कमजोर पड़ने लगती है जो महिला घर में हमेशा कलह फैलाती है कहा जाता है कि जिस घर में हर समय लड़ाई-झगड़ा और तनाव बना रहता है, वहां सकारात्मक ऊर्जा टिक नहीं पाती। इसलिए जो महिला छोटी-छोटी बातों पर घर में विवाद बढ़ाती हो, उसे पहले घर में शांति बनाने का प्रयास करना चाहिए। वट सावित्री व्रत परिवार की एकता और सुख का प्रतीक माना जाता है। पुराने समय में महिलाएं इस दिन पूरे परिवार को साथ बैठाकर पूजा करती थीं ताकि घर में प्रेम बना रहे। जो महिला पूजा को बोझ समझती है कुछ महिलाएं केवल मजबूरी में व्रत रखती हैं और पूरे दिन मन में यही सोचती रहती हैं कि कब यह पूजा खत्म हो। धर्म में कहा गया है कि बिना मन के किया गया कार्य अधूरा माना जाता है। अगर पूजा बोझ लगने लगे, तो पहले उसके महत्व को समझना जरूरी है। श्रद्धा और खुशी से किया गया छोटा सा पूजा-पाठ भी बड़ा फल देता है।. जो महिला दूसरों का बुरा चाहती है धर्म में सबसे बड़ी बात मन की पवित्रता को माना गया है। अगर कोई महिला पूजा तो करे लेकिन मन में दूसरों के लिए जलन, ईर्ष्या और बुरा सोच रखे, तो यह शुभ नहीं माना जाता। वट सावित्री व्रत का उद्देश्य केवल अपना नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए मंगल कामना करना भी माना गया है। इसलिए इस दिन मन में प्रेम, दया और शुभ भावना रखना सबसे जरूरी बताया गया है। जो महिला व्रत के दिन बार-बार क्रोध करती है धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि वट सावित्री व्रत के दिन मन को शांत रखना सबसे बड़ा नियम माना जाता है। लेकिन कुछ महिलाएं छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगती हैं, घरवालों पर चिल्लाती हैं और पूरे दिन तनाव का वातावरण बना देती हैं। माना जाता है कि क्रोध से पूजा की सकारात्मक ऊर्जा कमजोर पड़ने लगती है। पुराने समय में बुजुर्ग महिलाएं कहती थीं कि इस दिन जितना शांत मन रहेगा, उतना ही अधिक शुभ फल प्राप्त होगा। इसलिए व्रत के दिन धैर्य, प्रेम और संयम बनाए रखना बहुत जरूरी माना गया है। जो महिला पूजा के समय मोबाइल और दुनियादारी में लगी रहती है आज के समय में बहुत लोग पूजा करते समय भी ध्यान इधर-उधर लगाए रखते हैं। कोई मोबाइल चलाता रहता है, कोई बातचीत में लगा रहता है, तो कोई केवल फोटो और वीडियो बनाने में व्यस्त रहता है। धर्म में कहा गया है कि पूजा के समय मन पूरी तरह भगवान और माता सावित्री की भक्ति में होना चाहिए। अगर मन भटकता रहे, तो पूजा का प्रभाव अधूरा माना जाता है। पुराने समय में महिलाएं पूरे ध्यान और श्रद्धा के साथ वट वृक्ष की पूजा करती थीं और उसी को व्रत की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता था। जो महिला व्रत रखकर भी अपवित्र चीजों में लगी रहती है वट सावित्री व्रत को शुद्धता का व्रत माना गया है। इसलिए इस दिन शरीर, मन और घर की सफाई का विशेष महत्व बताया गया है। अगर कोई महिला व्रत रखकर भी गंदगी, अपवित्रता या अशुभ कामों में लगी रहती है, तो यह शुभ नहीं माना जाता। पुराने समय में महिलाएं सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनती थीं और पूजा स्थल को भी पूरी तरह शुद्ध रखती थीं। माना जाता है कि जहां स्वच्छता होती है, वहीं देवी-देवताओं की कृपा अधिक रहती है। जो महिला दूसरों की निंदा करती है धर्म शास्त्रों में निंदा को बहुत बड़ा दोष माना गया है। कई महिलाएं पूजा करते-करते भी दूसरों की बुराई करने लगती हैं, रिश्तेदारों की गलतियां गिनाने लगती हैं या पड़ोसियों की चर्चा में समय बिताती हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मन की पवित्रता खत्म होने लगती है। वट सावित्री व्रत के दिन विशेष रूप से शुभ बातें बोलना और अच्छे विचार रखना जरूरी माना गया है। पुराने समय में महिलाएं इस दिन कथा, भजन और भगवान का नाम लेने में समय बिताती थीं। जो महिला व्रत को अधूरा छोड़ देती है कई बार कुछ महिलाएं बिना कारण व्रत शुरू तो कर देती हैं लेकिन बीच में ही नियम तोड़ देती हैं या पूजा अधूरी छोड़ देती हैं। धर्म में कहा गया है कि कोई भी व्रत संकल्प के साथ शुरू किया जाए तो उसे श्रद्धा के साथ पूरा करना चाहिए। अगर स्वास्थ्य या मजबूरी की स्थिति हो तो अलग बात है, लेकिन लापरवाही से व्रत तोड़ना अच्छा नहीं माना जाता। पुराने समय में महिलाएं संकल्प लेने के बाद पूरे नियम और विश्वास के साथ व्रत पूरा करती थीं जो महिला घर में माता-पिता और सास-ससुर का अनादर करती है वट सावित्री व्रत केवल पति की लंबी आयु का व्रत नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सुख-शांति का प्रतीक माना गया है। इसलिए जो महिला घर के बड़ों का सम्मान नहीं करती, उनकी बातों को अपमानित करती है या उन्हें दुख पहुंचाती है, उसके लिए यह स्थिति शुभ नहीं मानी जाती। कहा जाता है कि बड़ों का आशीर्वाद घर की सबसे बड़ी रक्षा कवच होता है। जहां बुजुर्गों का सम्मान होता है, वहां सुख और समृद्धि अधिक समय तक टिकती है। जो महिला व्रत के दिन झूठ बोलती है सत्य को धर्म की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। इसलिए वट सावित्री व्रत के दिन झूठ बोलना, धोखा देना या किसी को भ्रमित करना अच्छा नहीं माना जाता। माना जाता है कि माता सावित्री का पूरा जीवन सत्य, निष्ठा और पवित्रता का प्रतीक था। इसलिए इस दिन सच्चाई और ईमानदारी का पालन करना बहुत जरूरी बताया गया है। पुराने समय में महिलाएं इस दिन मन, वचन और कर्म तीनों को शुद्ध रखने का प्रयास करती थीं। जो महिला जरूरतमंदों की मदद नहीं करती धर्म में दान और सेवा को बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। अगर कोई महिला केवल अपने लिए पूजा करे लेकिन जरूरतमंदों की सहायता न करे, तो पूजा का फल अधूरा माना जाता है। वट सावित्री व्रत के दिन गरीबों को भोजन, वस्त्र या फल देने की परंपरा भी बहुत पुरानी मानी जाती है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया छोटा सा दान भी कई गुना पुण्य देता है। जो महिला हर समय ईर्ष्या और जलन में रहती है कई लोग दूसरों की खुशियां देखकर दुखी होने लगते हैं। धर्म में कहा गया है कि ईर्ष्या मन की शांति को खत्म कर देती है। अगर कोई महिला पूजा तो करे लेकिन मन में दूसरों के लिए जलन रखे, तो व्रत की सकारात्मक ऊर्जा कमजोर पड़ सकती है। वट सावित्री व्रत में शुभ भावना और दूसरों के लिए मंगल कामना करना सबसे जरूरी माना गया है जो महिला भगवान और व्रत की शक्ति पर विश्वास नहीं रखती धर्म में विश्वास को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। अगर कोई महिला केवल मजबूरी या डर की वजह से व्रत रखे लेकिन मन में श्रद्धा ही न हो, तो उसे पहले व्रत के महत्व को समझना चाहिए। कहा जाता है कि जहां सच्चा विश्वास होता है, वहीं पूजा का प्रभाव दिखाई देता है। पुराने समय में महिलाएं पूरी आस्था और समर्पण के साथ यह व्रत करती थीं और उसी श्रद्धा को सबसे बड़ा पुण्य माना जाता था। जो महिला व्रत के दिन बार-बार अपशकुन वाली बातें करती है वट सावित्री व्रत को मंगल और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन बार-बार मृत्यु, दुख, बीमारी या अशुभ घटनाओं की बातें करना अच्छा नहीं माना गया। पुराने समय में बुजुर्ग महिलाएं कहती थीं कि व्रत के दिन जैसी वाणी और सोच होती है, वैसा ही वातावरण घर में बनने लगता है। इसलिए इस दिन शुभ बोलना, भगवान का नाम लेना और सकारात्मक बातें करना बेहद जरूरी माना गया है। कहा जाता है कि जहां शुभ शब्द बोले जाते हैं, वहां देवी-देवताओं की कृपा अधिक समय तक बनी रहती है। जो महिला पूजा करते समय हंसी-मजाक और खिलवाड़ करती है धर्म में पूजा को साधना और भक्ति का समय माना गया है। लेकिन कई लोग पूजा के समय भी मजाक, तेज हंसी या इधर-उधर की बातें करने लगते हैं। माना जाता है कि इससे पूजा की गंभीरता खत्म होने लगती है। पुराने समय में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा बहुत शांत और श्रद्धा के साथ करती थीं। इस दिन मन और व्यवहार दोनों में संयम रखना जरूरी माना गया है। कहा जाता है कि जितना शांत मन होगा, उतना अधिक पूजा का प्रभाव दिखाई देगा। जो महिला घर को गंदा और अव्यवस्थित रखती है वट सावित्री व्रत के दिन घर की सफाई और पवित्रता का विशेष महत्व बताया गया है। धर्म मान्यताओं के अनुसार जहां गंदगी, टूटी-फूटी चीजें और नकारात्मक वातावरण होता है, वहां सकारात्मक ऊर्जा कम होने लगती है। इसलिए पुराने समय में महिलाएं इस व्रत से पहले पूरे घर की साफ-सफाई करती थीं, पूजा स्थान को सजाती थीं और घर में दीपक जलाकर शुभ वातावरण बनाती थीं। माना जाता है कि स्वच्छ घर में देवी लक्ष्मी और माता सावित्री की कृपा जल्दी आती है। जो महिला दूसरों के व्रत और पूजा का मजाक उड़ाती है कई बार कुछ लोग खुद पूजा करते हैं लेकिन दूसरों की श्रद्धा का मजाक उड़ाने लगते हैं। धर्म में इसे बहुत बड़ा दोष माना गया है। कहा जाता है कि किसी की भक्ति और विश्वास का अपमान करने से पुण्य कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए वट सावित्री व्रत के दिन विशेष रूप से दूसरों की श्रद्धा का सम्मान करना चाहिए। पुराने समय में कहा जाता था कि भगवान भावना देखते हैं, दिखावा नहीं जो महिला पूरे दिन केवल बाहरी सजावट में लगी रहती है श्रृंगार करना सुहागन स्त्रियों के लिए शुभ माना गया है, लेकिन अगर पूरा ध्यान केवल कपड़े, गहने और दिखावे पर ही रह जाए और पूजा में मन ही न लगे, तो इसे अधूरा व्रत माना जाता है। धर्म में बाहरी सुंदरता से ज्यादा मन की भक्ति को महत्व दिया गया है। पुराने समय की महिलाएं सादगी और श्रद्धा के साथ पूजा करती थीं और उसी को सबसे बड़ा श्रृंगार माना जाता था। जो महिला व्रत के दिन किसी का दिल दुखाती है धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पूजा-पाठ तभी सफल माना जाता है जब किसी को कष्ट न पहुंचाया जाए। अगर कोई महिला व्रत रखकर भी दूसरों को ताने देती हो, नौकर-चाकरों या परिवार वालों को अपमानित करती हो, तो यह शुभ नहीं माना जाता। कहा जाता है कि किसी का दिल दुखाने से पूजा का पुण्य कम होने लगता है। इसलिए इस दिन दया, प्रेम और मधुर व्यवहार रखना बहुत जरूरी बताया गया है।जो महिला भगवान का नाम लेने में आलस्य करती है वट सावित्री व्रत केवल एक परंपरा नहीं बल्कि भक्ति और साधना का दिन माना गया है। इसलिए इस दिन भगवान का नाम लेना, कथा सुनना और मंत्र जाप करना शुभ माना जाता है। लेकिन अगर कोई महिला केवल रस्म निभाकर पूजा खत्म कर दे और पूरे दिन भक्ति से दूर रहे, तो व्रत का प्रभाव कम माना जाता है। पुराने समय में महिलाएं पूरे दिन भजन और कथा में मन लगाती थीं।जो महिला व्रत के दिन झूठी शान दिखाती है कई लोग पूजा-पाठ में भी दूसरों से तुलना करने लगते हैं कि किसने ज्यादा महंगी पूजा की, किसने ज्यादा सामान चढ़ाया। धर्म में इसे अहंकार माना गया है। कहा जाता है कि भगवान को दिखावा नहीं बल्कि सच्ची श्रद्धा प्रिय होती है। अगर मन में घमंड आ जाए, तो पूजा का पुण्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। जो महिला अपने घर के लोगों की उपेक्षा करती है वट सावित्री व्रत परिवार की एकता और प्रेम का प्रतीक माना गया है। अगर कोई महिला बाहर पूजा-पाठ में लगी रहे लेकिन अपने ही परिवार के लोगों से कठोर व्यवहार करे, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज करे, तो यह स्थिति शुभ नहीं मानी जाती। पुराने समय में महिलाएं इस दिन पूरे परिवार के सुख और शांति की कामना करती थीं जो महिला व्रत को केवल डर की वजह से करती है धर्म में भय नहीं बल्कि श्रद्धा को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। कई महिलाएं यह सोचकर व्रत करती हैं कि अगर नहीं किया तो कोई अनहोनी हो जाएगी। लेकिन पुराने समय के ज्ञानी लोग कहते थे कि पूजा हमेशा प्रेम और विश्वास से करनी चाहिए, डर से नहीं। जहां सच्ची श्रद्धा होती है, वहीं व्रत का वास्तविक फल प्राप्त होता है।