premanand
от radha madhavश्राद्ध पक्ष के इस पावन अवसर पर आज हम पितरों की पूजा और तर्पण की महिमा और विधि को समझेंगे। सनातन धर्म में पितरों का स्थान देवताओं के समान माना गया है। शास्त्र कहते हैं – “पितृदेवो भव” अर्थात् अपने माता-पिता और पूर्वजों को देवताओं के समान मानकर उनकी सेवा और स्मरण करना चाहिए। पितरों की स्मृति के बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है। जिस प्रकार कोई वृक्ष अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ होता है, उसी प्रकार हम अपने पितरों से जुड़े हुए हैं। यदि हम अपनी जड़ों को सींचते हैं तो हमारा जीवन भी फलता-फूलता है। इसलिए श्राद्ध पक्ष का महत्व बहुत गहरा है। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक का समय पितरों की तृप्ति के लिए उत्तम माना गया है। इस काल में जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक तर्पण करता है, उसके पितर प्रसन्न होकर वंशजों को उत्तम स्वास्थ्य, संतान, धन, आयु और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
अब आइए तर्पण की विधि को समझें। सबसे पहले प्रातःकाल स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें। मन को शांत और पवित्र करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। तर्पण से पहले संकल्प लिया जाता है। संकल्प का अर्थ है – अपने मन में यह निश्चित करना कि मैं किस उद्देश्य से यह कर्म कर रहा हूँ। आप अपने दाहिने हाथ में जल, तिल और कुश लेकर कहें – “मैं अमुक गोत्र का अमुक नाम, अपने पितरों की तृप्ति के लिए यह तर्पण कर रहा हूँ।” संकल्प के पश्चात् कुश से पवित्री बनाकर दाहिने हाथ में धारण करें। इसके बाद देवताओं, ऋषियों और पितरों का ध्यान करें। उच्चारण करें – “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः, ॐ पितामहभ्यः स्वधा नमः, ॐ प्रपितामहभ्यः स्वधा नमः।” इन मंत्रों का जप करते हुए अपने मन में अपने पिता, पितामह और प्रपितामह का स्मरण करें। यदि नाम ज्ञात हों तो उनका नाम लें, यदि न हों तो भी केवल श्रद्धा से स्मरण करना पर्याप्त है।
अब तर्पण की मुख्य क्रिया प्रारंभ करें। एक स्वच्छ ताँबे या पीतल के पात्र में जल लें। उसमें काले तिल, पुष्प और कुश डालें। दाहिने हाथ से यह जल धीरे-धीरे दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित करें। यह जल प्रवाह करते समय महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करें – “ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”। इस मंत्र का अर्थ है – हम उस तीन नेत्रों वाले भगवान शिव का पूजन करते हैं, जो सबको जीवन देने वाले और पुष्ट करने वाले हैं। जैसे पककर बेल का फल डंठल से अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों और अमृत स्वरूप का अनुभव करें। यह मंत्र पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए अत्यंत कल्याणकारी है।
अब पिण्डदान की प्रक्रिया आती है। यदि संभव हो तो जौ का आटा, चावल और तिल मिलाकर छोटे-छोटे पिण्ड बनाएं। इन पिण्डों को दक्षिण दिशा की ओर रखकर अर्पित करें और कहें – “ॐ पितृभ्यो नमः, एतत् पिण्डं पितृभ्यः समर्पयामि।”। शास्त्रों में कहा गया है कि यह पिण्ड हमारे पितरों का भोजन माना जाता है। जैसे हम अपने घर आए अतिथि को अन्न और जल अर्पित करते हैं, वैसे ही पितरों को यह पिण्ड और तर्पण अर्पित करके उन्हें संतुष्ट करते हैं। पिण्डदान न हो सके तो केवल तिलांजलि और जलदान करना भी पर्याप्त है।
श्राद्ध की एक अन्य महत्वपूर्ण विधि है – ब्राह्मण भोजन और दान। पुराणों में कहा गया है कि ब्राह्मण और गौ की तृप्ति ही पितरों की तृप्ति है। इसीलिए श्राद्ध तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराना और यथाशक्ति वस्त्र, अन्न या दक्षिणा देना चाहिए। यदि यह भी संभव न हो तो मन से संकल्प करके केवल जल, तिल और मंत्रों द्वारा भी श्राद्ध किया जा सकता है। यहाँ मुख्य बात है श्रद्धा। यही कारण है कि ‘श्राद्ध’ शब्द का अर्थ ही है – श्रद्धा से किया गया कार्य।
श्राद्ध और तर्पण करते समय एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि इसमें आडंबर या दिखावे की कोई आवश्यकता नहीं है। मुख्य महत्व है हमारी भावनाओं और श्रद्धा का। यदि पूरे विधान के साथ करना संभव न हो तो केवल तिलांजलि देकर और “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः” मंत्र का जप करके भी पितरों को तृप्त किया जा सकता है। हमारे शास्त्र हमें यह संदेश देते हैं कि पितरों के स्मरण और तर्पण से ही जीवन में स्थिरता, उन्नति और शांति बनी रहती है।
अंत में समापन के समय अपने पितरों से प्रार्थना करें – “हे पितरों! आप इस तर्पण से तृप्त हों, हम पर कृपा करें और हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि प्रदान करें।” इसके साथ ही यह संकल्प करें कि हम सदैव अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलेंगे, उनके संस्कारों को याद रखेंगे और अपनी संतानों को भी यह परंपरा सिखाएंगे।
श्राद्ध पक्ष हमें यह शिक्षा देता है कि हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ बने रहें। जैसे किसी वृक्ष को मजबूत बनाने के लिए उसकी जड़ों को सींचा जाता है, वैसे ही पितरों का स्मरण और तर्पण हमारे जीवन को मजबूत बनाता है। हमारे पितर प्रसन्न हों, हम सब पर अपनी कृपा बनाए रखें और हमें सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करें। ॐ शांति शांति शांति॥