आखिरी बस स्टॉप
तीन दोस्त—कुणाल, मीरा और फैज़ल—पहाड़ों के बीच एक सुनसान सड़क से गुजर रहे थे।
रात काफी हो चुकी थी और चारों तरफ सिर्फ घना अंधेरा, ठंडी हवा और दूर-दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दे रहे थे।
अचानक उनकी कार झटके से बंद हो गई।
कुणाल ने कई बार कार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन ने जवाब दे दिया।
तीनों कार से बाहर निकले और मदद की तलाश में सड़क के किनारे आगे बढ़ने लगे।
कुछ दूर उन्हें एक छोटी-सी चाय की दुकान दिखाई दी।
दुकान के बाहर एक बूढ़ा आदमी चुपचाप बैठा था।
उसका नाम हरिनाथ काका था।
कुणाल ने उससे पूछा—
“काका, यहाँ आसपास कोई मैकेनिक मिलेगा?”
हरिनाथ काका ने बिना उनकी तरफ देखे कहा—
“इस रास्ते पर रात में कोई नहीं मिलता बेटा।”
फैज़ल ने घबराकर पूछा—
“तो फिर हम जाएँ कहाँ?”
हरिनाथ काका ने सड़क के सामने बने पुराने बस स्टॉप की तरफ इशारा किया।
“वहाँ से कभी-कभी बस आती है।”
तीनों के चेहरे पर थोड़ी राहत आई।
लेकिन तभी काका ने उन्हें रोकते हुए कहा—
“बस आए तो उसमें बैठना मत।”
कुणाल हैरान होकर बोला—
“क्यों?”
काका ने इस बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“क्योंकि वो बस यात्रियों को उनके घर नहीं ले जाती।”
तीनों कुछ समझ नहीं पाए।
उन्होंने सोचा कि बूढ़ा आदमी उन्हें डराने की कोशिश कर रहा है।
कुछ देर बाद अचानक दूर से बस के इंजन की आवाज सुनाई दी।
घने कोहरे के बीच दो पीली हेडलाइट्स दिखाई दीं।
बस धीरे-धीरे उनके सामने आकर रुक गई।
बस बिल्कुल पुरानी थी।
उसकी खिड़कियों पर धूल जमी थी और अंदर बैठे यात्री बिल्कुल शांत थे।
किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
मीरा ने खिड़की से अंदर देखा।
तभी उसकी नजर बस की आखिरी सीट पर बैठी एक लड़की पर पड़ी।
वो लड़की बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।
मीरा घबरा गई।
उसने तुरंत पीछे हटकर कहा—
“कुणाल... वो लड़की मुझे जैसी क्यों दिख रही है?”
कुणाल ने खिड़की से अंदर देखा।
लेकिन अब आखिरी सीट खाली थी।
फैज़ल डरकर बोला—
“चलो यहाँ से निकलते हैं।”
तीनों वापस चाय की दुकान की तरफ भागे।
हरिनाथ काका अभी भी वहीं बैठे थे।
कुणाल ने गुस्से में पूछा—
“काका, ये बस क्या है?”
काका ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने अपनी दुकान के अंदर से एक पुरानी रजिस्टर निकाली।
रजिस्टर के पन्ने पलटते-पलटते उन्होंने एक जगह उंगली रोक दी।
उस पन्ने पर कई नाम लिखे थे।
कुणाल और फैज़ल कुछ समझ नहीं पाए।
लेकिन मीरा की नजर एक नाम पर जाकर रुक गई।
वहाँ लिखा था—
“मीरा शर्मा।”
मीरा के हाथ कांपने लगे।
उसने पूछा—
“ये नाम यहाँ कैसे है?”
हरिनाथ काका ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि तुम इस रास्ते पर पहले भी आ चुकी हो।”
मीरा ने सिर हिलाते हुए कहा—
“नहीं... मैं कभी यहाँ नहीं आई।”
काका बोले—
“दस साल पहले इसी सड़क पर एक बस का भयानक हादसा हुआ था।”
“बस में बयालीस यात्री थे।”
“हादसे में इकतालीस लोगों की मौत हो गई।”
“सिर्फ एक बच्ची जिंदा बची थी।”
कुणाल ने पूछा—
“वो बच्ची कौन थी?”
हरिनाथ काका ने मीरा की तरफ देखा।
“मीरा।”
मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसे अचानक अपने बचपन की कुछ धुंधली तस्वीरें याद आने लगीं।
एक पुरानी बस...
अंधेरी सड़क...
किसी के चीखने की आवाज...
और फिर सब कुछ अंधेरा।
मीरा ने अपना सिर पकड़ लिया।
फैज़ल ने उसे संभालते हुए कहा—
“मीरा, तुम्हें कुछ याद आ रहा है?”
मीरा ने कांपती आवाज में कहा—
“बस... इतना याद है कि मैं बहुत डर गई थी।”
हरिनाथ काका ने कहा—
“उस हादसे के बाद तुम्हारी याददाश्त चली गई थी।”
“तुम्हें दूसरे शहर के एक परिवार ने अपनाया।”
“लेकिन वो बस तुम्हें कभी भूल नहीं पाई।”
अचानक बाहर फिर वही बस का हॉर्न सुनाई दिया।
तीनों ने बाहर देखा।
बस दोबारा बस स्टॉप पर खड़ी थी।
लेकिन इस बार बस के दरवाजे खुले थे।
और अंदर से एक ठंडी हवा बाहर आ रही थी।
मीरा के कानों में अचानक एक धीमी आवाज गूंजी—
“यात्रा... पूरी करो...”
मीरा पीछे हट गई।
कुणाल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम कहीं नहीं जाओगी।”
हरिनाथ काका ने गंभीर आवाज में कहा—
“अगर वो तुम्हें लेने आई है... तो आज रात ये सफर खत्म होगा।”
कुणाल ने पूछा—
“काका, आप इस बस के बारे में इतना सब कैसे जानते हैं?”
हरिनाथ काका कुछ पल चुप रहे।
फिर उन्होंने रजिस्टर का आखिरी पन्ना खोला।
वहाँ बयालीस नाम लिखे थे।
मीरा का नाम सबसे नीचे था।
लेकिन उसके ऊपर लिखा था—
“यात्री संख्या 42।”
फैज़ल ने डरते हुए पूछा—
“बाकी इकतालीस लोग कहाँ हैं?”
हरिनाथ काका ने बस की तरफ देखते हुए कहा—
“जहाँ उन्हें होना चाहिए।”
बस का दरवाजा अचानक अपने आप खुल गया।
अंदर बैठे सारे यात्रियों ने एक साथ अपनी गर्दन घुमाकर मीरा की तरफ देखा।
मीरा डर के मारे पीछे हट गई।
कुणाल चिल्लाया—
“सब लोग पीछे हटो!”
लेकिन तभी बस के अंदर बैठी वो लड़की दिखाई दी जो मीरा जैसी दिखती थी।
वो धीरे-धीरे उठी।
और उसने मीरा की तरफ हाथ बढ़ाया।
मीरा की आँखों के सामने अचानक पूरा हादसा घूम गया।
उसे याद आया...
वो बस में बैठी थी।
उसके माता-पिता उसके साथ थे।
बारिश हो रही थी।
ड्राइवर बहुत तेज बस चला रहा था।
फिर अचानक सामने पहाड़ से पत्थर गिरा।
बस सड़क से फिसली।
लोग चीखने लगे।
और उसी वक्त मीरा को किसी ने बस की खिड़की से बाहर धकेल दिया था।
वो पहाड़ी के नीचे जा गिरी थी।
इसीलिए वो बच गई थी।
लेकिन बस में मौजूद बाकी सभी लोग मारे गए थे।
मीरा ने आंखें खोलते हुए कहा—
“मुझे सब याद आ गया।”
कुणाल ने पूछा—
“किसने तुम्हें बाहर निकाला था?”
मीरा ने हरिनाथ काका की तरफ देखा।
हरिनाथ काका चुप थे।
मीरा धीरे से बोली—
“आप...”
काका ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस के अंदर से फिर हॉर्न की आवाज आई।
इस बार बस के सभी यात्री खड़े हो चुके थे।
हरिनाथ काका ने मीरा से कहा—
“अब ये बस तुम्हें लेने आई है।”
कुणाल ने कहा—
“हम मीरा को कहीं नहीं जाने देंगे।”
हरिनाथ काका मुस्कुराए।
“तुम उसे रोक नहीं सकते।”
फैज़ल ने पूछा—
“आप इतने शांत कैसे हैं?”
काका ने धीरे से कहा—
“क्योंकि मेरा सफर भी उसी रात खत्म हो गया था।”
तीनों कुछ समझ नहीं पाए।
कुणाल ने पूछा—
“क्या मतलब?”
हरिनाथ काका ने बस की तरफ कदम बढ़ाया।
“मैं भी उस बस में था।”
फैज़ल के हाथ से रजिस्टर गिर गया।
मीरा ने डरते हुए कहा—
“लेकिन... अगर आप उस बस में थे... तो आप जिंदा कैसे हैं?”
हरिनाथ काका ने बस के दरवाजे पर खड़े होकर पीछे मुड़कर देखा।
“मैं जिंदा नहीं हूँ।”
ये सुनते ही मीरा और कुणाल के चेहरे पर डर जम गया।
हरिनाथ काका बस के अंदर चले गए।
दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
बस धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
मीरा चिल्लाई—
“काका!”
लेकिन बस रुकने वाली नहीं थी।
कुछ ही सेकंड में वो घने कोहरे के अंदर गायब हो गई।
सुबह पुलिस को सड़क के किनारे एक बंद कार मिली।
पास ही वही पुराना बस स्टॉप था।
चाय की दुकान भी मौजूद थी।
लेकिन वहाँ कोई बूढ़ा आदमी नहीं था।
दुकान के अंदर सिर्फ एक पुराना रजिस्टर पड़ा था।
पुलिस ने रजिस्टर उठाया।
उसी समय उन्हें जमीन पर पड़ा दस साल पुराना अखबार मिला।
अखबार में उसी बस हादसे की खबर छपी थी।
खबर में मरने वाले यात्रियों की सूची थी।
पुलिस ने सूची पढ़ी।
और एक नाम देखकर उनके होश उड़ गए।
हरिनाथ काका।
उनकी सीट थी...
ड्राइवर के ठीक पीछे।
तभी दूर पहाड़ों के बीच एक बस का हॉर्न सुनाई दिया।
पुलिस ने सड़क की तरफ देखा।
लेकिन वहाँ कोई बस नहीं थी।
सिर्फ घना कोहरा था।
और उस कोहरे के अंदर से एक धीमी आवाज आई—
“अगला यात्री... कौन है?”
फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया।
क्योंकि उस रास्ते की वो बस कभी वापस नहीं आती...
क्योंकि वो बस कभी गई ही नहीं थी।
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vor 2 Monaten
hi
Männlich
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Dramatisch
Geheimnisvoll
Geschichtenerzählen
Professionell
Ruhig
Ausdrucksstark
वह CCTV फुटेज देख रहा था। अचानक, स्क्रीन पर कुछ ऐसा दिखा जिसने उसे अंदर तक डरा दिया। रात के अंधेरे में, बारिश में भीगा हुआ एक साया खड़ा था, जो असल में वहां नहीं होना चाहिए था।