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Hvcy Vcgj에 의해रात साढ़े बारह बजे थे।
दिल्ली की सड़कें सूनी पड़ी थीं, जैसे शहर की सारी सांसें थम गई हों।
हवा में एक ठंडक थी, जो हड्डियों तक उतर जाती थी।
राहुल अपने अपार्टमेंट में बैठा था।
लैपटॉप की स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
वो एक जर्नलिस्ट था, जो हमेशा अनसुलझे रहस्यों की तलाश में रहता था।
आज वो पढ़ रहा था अघोरियों के बारे में—उनकी श्मशान साधनाओं के बारे में।
किताबों और इंटरनेट पर फैली कहानियां उसे खींच रही थीं।
"शव साधना... मुर्दा बोल उठता है," वो बड़बड़ाया।
उसकी आंखें फैल गईं।
क्या ये सच हो
सकता है?उसके फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम चमका—अमित, उसका पुराना दोस्त।
राहुल ने कॉल उठाया।
"क्या हो रहा है भाई? इतनी रात को जाग रहा है?"
अमित की आवाज में हंसी थी, लेकिन राहुल गंभीर था।
"अमित, तूने कभी श्मशान साधना के बारे में सुना है?
अघोरी लोग रात में श्मशान जाते हैं, मुर्दों से बात करते हैं।
शिव साधना में शव पर पैर रखकर खड़े रहते हैं।
और शव साधना में... मुर्दा इच्छाएं पूरी करता है।"
अमित हंस पड़ा।
"अरे यार, ये सब अफवाहें हैं। तू ज्यादा पढ़ता है।
लेकिन अगर सच में जानना चाहता है, तो उज्जैन जा।
वहां चक्रतीर्थ का श्मशान मशहूर है।
चंद्रपाल नाम का एक अघोरी है, वो दिखा सकता है।
लेकिन सावधान रहना, वो जगह मौत का घर है।"
राहुल की उत्सुकता बढ़ गई।
अगली सुबह वो ऑफिस गया, बॉस से बात की।
"सर, एक स्टोरी पर काम कर रहा हूं—अघोरियों की दुनिया पर।
उज्जैन जाना पड़ेगा।"
बॉस ने हामी भरी।
"ठीक है, लेकिन सेफ रहना। वो लोग खतरनाक होते हैं।"
राहुल ने पैकिंग की।
कार में बैठा, वो सोच रहा था।
तारापीठ, कामाख्या पीठ—ये जगहें जहां साधनाएं होती हैं।
श्मशान साधना में परिवार वाले भी शामिल हो सकते हैं,
लेकिन शव और शिव साधना... वो वर्जित हैं।
कार की खिड़की से बाहर देखते हुए, उसे लगा कोई उसे घूर रहा है।
लेकिन वहां कोई नहीं था। सिर्फ अंधेरा।
हाईवे पर फॉग घनी थी, और रेडियो से कभी-कभी खरखराहट सुनाई देती,
जैसे कोई फुसफुसा रहा हो।
एक ढाबे पर रुका, जहां बूढ़ा आदमी बोला,
"बेटा, रात में आगे मत जाना, श्मशान की आत्माएं भटकती हैं।"
राहुल ने अनसुना किया, लेकिन दिल में एक सिहरन दौड़ गई।
उज्जैन पहुंचते ही शाम हो गई।
शिप्रा नदी का पानी काला लग रहा था, जैसे उसमें मौत घुली हो।
राहुल ने एक लोकल गाइड से पूछा।
"भैया, चंद्रपाल बाबा कहां मिलेंगे?"
गाइड सहम गया।
"बाबू, वो श्मशान में रहते हैं। रात में जाना।
लेकिन अकेले मत जाना। वहां आत्माएं भटकती हैं।"
राहुल ने हंसी उड़ा दी।
"मैं जर्नलिस्ट हूं, डरता नहीं।"
लेकिन अंदर से एक कंपकंपी थी।
वो श्मशान की ओर बढ़ा।
रास्ते में कुत्ते भौंक रहे थे, जैसे चेतावनी दे रहे हों।
श्मशान घाट पर पहुंचा, तो चारों तरफ चिताएं जल रही थीं।
लपटें लाल-पीली, धुंध फैली हुई।
एक कोने में एक आदमी बैठा था, लंबे जटाएं, आंखें लाल।
"कौन हो तुम?" उसकी आवाज गहराई थी,
"मैं राहुल हूं, दिल्ली से। आपकी साधना देखना चाहता हूं। शव साधना..."
राहुल ने कहा।
चंद्रपाल ने मुस्कुराया, लेकिन वो मुस्कान डरावनी थी।
"बेटा, मौत से खेलने आए हो?
शव साधना में मुर्दा बोलता है, लेकिन वो तुम्हारी जान भी ले सकता है।
शिव साधना में शव पर पैर रखो, जैसे पार्वती जी ने शिव पर। रखा था
और प्रसाद... मांस और मदिरा। तैयार हो?"
राहुल ने हां कहा।
"हां बाबा, दिखाइए।"
चंद्रपाल का शिष्य—एक पतला लड़का, नाम विक्रम—वहां आया।
"गुरुजी, चिता तैयार है। ताजा शव है।"
विक्रम की आवाज कांप रही थी।
राहुल का दिल धड़कने लगा।
रात गहरा रही थी।
चंद्रपाल ने कहा,
"कल रात शुरू करेंगे। आज जाओ, सोच लो।
श्मशान साधना आसान है, लेकिन ये... घोर है।"
राहुल होटल लौटा।
रात में सपना आया—श्मशान, मुर्दा उठकर बोल रहा था,
"राहुल... आओ..."
वो चौंककर उठा। पसीना बह रहा था।
क्या वो जा पाएगा?
लेकिन उत्साह ने उसे रोक नहीं पाया।
अगली शाम वो फिर श्मशान पहुंचा।
चंद्रपाल इंतजार कर रहा था।
"आ गए। अच्छा, सुनो।
जब विक्रम कहे, चले जाना। वरना आत्मा फंस जाएगी।"
राहुल ने सहमति दी।
साधना की तैयारी शुरू हुई।
हवा में गंध—जली लकड़ियों की, सड़ते मांस की।
राहुल की सांसें तेज हो गईं।
क्या होगा आज रात?
रात के दो बजे थे।
श्मशान में सन्नाटा था, सिर्फ चिताओं की लपटों की आवाज। आ रही थी
राहुल दूर खड़ा था, 1
चंद्रपाल शव के पास बैठा, मंत्र जप रहा था।
"ओम नमः शिवाय... ह्रां ह्रीं क्लीं..."
आवाज गूंज रही थी, जैसे पहाड़ों से टकराकर लौट रही हो।
विक्रम पास खड़ा था, उसका चेहरा पीला पड़ गया।
"भैया, डरो मत। गुरुजी जानते हैं," विक्रम ने राहुल से कहा।
लेकिन राहुल की आंखें शव पर टिकी थीं।
वो ताजा था, अभी जला नहीं था।
चंद्रपाल ने प्रसाद चढ़ाया—मांस का टुकड़ा, मदिरा की कुछ बूंदें।
गंध और तेज हो गई।
हवा में एक अजीब सी ठंडक फैल गई, जैसे कब्र से ठंडी सांस आ रही हो।
साधना चरम पर पहुंची।
चंद्रपाल खड़ा हुआ, शव पर पैर रखा।
"शिव साधना... पार्वती की तरह," वो बड़बड़ाया।
मंत्र तेज हो गए।
अचानक हवा रुक गई।
पेड़ों की पत्तियां हिलनी बंद हो गईं।
राहुल को लगा कोई उसे छू रहा है—ठंडा हाथ।
"क्या... क्या हो रहा है?" राहुल ने विक्रम से पूछा।
विक्रम कांपते हुए बोला,
"आत्माएं जाग रही हैं। मुर्दा बोलेगा।"
शव की छाती ऊपर-नीचे हुई।
एक कराह निकली। "आह..."
राहुल की आंखें फैल गईं।
"ये... बोल रहा है?"
चंद्रपाल ने पूछा,
"मुर्दे, बोल। क्या चाहते हो?"
शव से आवाज आई—खरखराती, पुरानी।
"शक्ति... दे दो।"
राहुल आगे बढ़ा।
"बाबा, मैं पूछ सकता हूं?"
चंद्रपाल ने मना किया।
"नहीं, दूर रहो।"
लेकिन राहुल नहीं माना।
"मुर्दे, क्या तुम इच्छाएं पूरी करते हो?"
शव हंसा—डरावनी हंसी।
"हां... लेकिन कीमत... आत्मा।" है
विक्रम ने राहुल को खींचा।
"चलो भैया, गुरुजी ने कहा था।"
लेकिन राहुल रुक गया।
अचानक धुंध घनी हो गई।
आत्माएं फुसफुसाने लगीं। "राहुल... रहो..."
राहुल का शरीर ठंडा पड़ गया।
चंद्रपाल ने मंत्र पढ़ा, साधना बंद की।
शव शांत हो गया।
"तुमने गलती की। अब आत्मा तुम्हारे पीछे पड़ेगी," चंद्रपाल ने कहा।
राहुल हंस पड़ा, लेकिन अंदर डर था।
"ये सब ट्रिक है न?"
लेकिन उसकी आवाज में कंपकंपी थी।
होटल लौटकर राहुल सो नहीं पाया।
रात में आवाजें सुनाई दीं—फुसफुसाहटें।
सुबह अमित को फोन किया।
"भाई, मैंने देखा। मुर्दा बोला!"
अमित चिंतित हो गया।
"राहुल, लौट आ। वो जगह श्रापित है।"
लेकिन राहुल ने कहा,
"नहीं, और देखूंगा। श्मशान साधना भी है, जहां परिवार शामिल होता है।"
शाम को फिर श्मशान गया।
चंद्रपाल वहां था।
"आज श्मशान साधना। शवपीठ की पूजा। गंगा जल, मावा प्रसाद।"
विक्रम ने शवपीठ तैयार किया—एक प्रतीक।
साधना शुरू हुई।
लेकिन बीच में एक आवाज आई—राहुल का नाम।
"राहुल... आओ।"
चंद्रपाल रुक गया।
"ये शव साधना की आत्मा है। तुमने जगाया, अब बंद करो।"
राहुल डर गया।
रात में होटल में, दर्पण में उसने देखा—उसकी आंखें लाल हो रही थीं।
"क्या हो रहा है?" वो चिल्लाया।
अगली सुबह दिल्ली लौटने का फैसला किया।
लेकिन कार में, सीट पर एक छाया—मुर्दे की।
"तुम्हारी आत्मा... मेरी।"
राहुल चीखा।
घर पहुंचा, लेकिन डर नहीं गया।
उसकी बहन प्रिया ने देखा।
"भाई, क्या हुआ? चेहरा पीला है।"
राहुल ने सब बताया।
"प्रिया, वो जगह... असली है। मुर्दे बोलते हैं।"
प्रिया हंसी।
"भाई, तू थक गया है। आराम कर।"
लेकिन रात में प्रिया को सपना आया—श्मशान, राहुल कराह रहा था।
उसकी नींद उड़ गई, और कमरे में एक ठंडी हवा चली,
जैसे कोई अदृश्य अस्तित्व पास हो।
दिल्ली में रातें अब डरावनी हो गईं।
राहुल सो नहीं पाता था।
हर रात सपने—श्मशान, चंद्रपाल, मुर्दा।
"राहुल... लौट आओ।"
वो ऑफिस नहीं जाता।
प्रिया चिंतित थी।
"भाई, डॉक्टर को दिखा।"
लेकिन राहुल जानता था, ये बीमारी नहीं।
एक शाम अमित आया।
"यार, तू बदल गया है। आंखें लाल क्यों?"
राहुल ने कहा,
"वो आत्मा... मेरे पीछे है। शव साधना ने जगाया।"था
अमित ने सलाह दी,
"उज्जैन वापस जा। चंद्रपाल से बंद करवा।"
राहुल माना।
प्रिया ने रोका।
"नहीं भाई, मैं भी चलूंगी।"
राहुल ने मना किया।
"नहीं, खतरा है।"
लेकिन प्रिया नहीं मानी, और दोनों कार से निकले।
रास्ते में हाईवे सुनसान था।
राहुल ने स्पीड बढ़ाई, प्रिया चुपचाप बैठी रही।
वो सीधे उज्जैन पहुंचे।
श्मशान अब और डरावना लग रहा था।
चंद्रपाल नहीं मिला।
विक्रम मिला, कांप रहा था।
"गुरुजी कहीं गए हैं
राहुल ने पूछा,
"कैसे बंद करूं?"
विक्रम बोला,
"शिव साधना से। लेकिन अकेले मत करना।"
रात हुई।
राहुल श्मशान में अकेला।
मंत्र पढ़ा। शव पर पैर रखा।
"ओम... बंद हो जा।"
लेकिन शव उठा।
"राहुल... अब तुम मेरे।"हो
आत्माएं घेर लीं।
राहुल भागा, लेकिन गिर पड़ा। विक्रम ने बचाया।
"भैया, तुम्हारी आत्मा आधी गई।"
राहुल की सांसें उखड़ी हुई थीं, और उसका चेहरा सफेद पड़ गया था।
दिल्ली लौटा।
अब प्रिया को भी आवाजें सुनाई देने लगीं।
"प्रिया... आओ।"
वो डर गई। राहुल को बताया।
"भाई, क्या करूं?"
राहुल ने कहा,
"उज्जैन चल। साथ में बंद करेंगे।"
वो गए।
श्मशान में विक्रम मिला।
"श्मशान साधना से कोशिश। परिवार वाली।"
साधना शुरू।
शवपीठ पर गंगा जल।
लेकिन बीच में कराह। "प्रिया... रहो।"
प्रिया चीखी।
"भाई, कोई छू रहा है!"
आत्मा दिखी—लाल साड़ी वाली औरत, चेहरा ढका हुआ, आंखें जलती हुईं।
विक्रम ने मंत्र पढ़ा।
लेकिन आत्मा नहीं गई।
"ये मजबूत है। चंद्रपाल की जरूरत।"है
प्रिया का शरीर कांप रहा था, और उसे लगा उसकी गर्दन पर ठंडे उंगलियां हैं।
चंद्रपाल मिला—दूर जंगल में।
"तुमने गलती की। अब तीन साधनाएं एक साथ।"करनी होगी
रात हुई। साधना शुरू।
मुर्दा बोला।
"कीमत... एक जान।"
राहुल ने कहा,
"मेरी ले लो।"
लेकिन आत्मा हंसी।
"सबकी।"
साधना के दौरान धुंध इतनी घनी हो गई कि सब कुछ धुंधला हो गया,
और आत्माओं की कराहें चारों तरफ गूंजने लगीं।
हवा में एक भारी गंध फैल गई—सड़ते मांस और जली हुई लकड़ी की मिली-जुली।
चंद्रपाल के मंत्र तेज होते गए,
लेकिन शव की आंखें खुल गईं।
काली, खाली, लेकिन चमकती हुईं।
वो सीधे राहुल को देख रहा था
राहुल का शरीर सुन्न पड़ गया।
उसे लगा जैसे कोई अदृश्य हाथ उसके सीने में घुस रहा हो,
उसकी सांसें चूस रहा हो।
प्रिया चिल्लाई,
"भाई!"
लेकिन उसकी आवाज धुंध में खो गई।
विक्रम पीछे हटा, उसके हाथ कांप रहे थे।
चंद्रपाल बोला,
"अब रुक नहीं सकते। या तो वो जाएगा या सब चले जाएंगे।"
राहुल ने हिम्मत जुटाई।
वो शव के और करीब गया।
उसने अपना हाथ शव की ठंडी छाती पर रखा।
"मैं तैयार हूं। ले लो मेरी जान। लेकिन इन्हें छोड़ दो।"
शव ने फिर हंसी।
हंसी अब और गहरी, और करीब थी—जैसे उसके कानों में ही बज रही हो।
"तुम्हारी जान... पहले से मेरी है।"
अचानक राहुल का शरीर हिलने लगा।
उसकी आंखें पीछे की तरफ घूम गईं।
मुंह से एक अजीब सी कराह निकली।
प्रिया ने उसे पकड़ने की कोशिश की,
लेकिन उसका हाथ ठंडा हो चुका था।
विक्रम चीखा,
"भैया!"
लेकिन देर हो चुकी थी।
धुंध में राहुल का शरीर उठा।
जैसे कोई अदृश्य ताकत उसे खींच रही हो।
उसकी आंखें अब पूरी तरह सफेद हो गईं।
शव ने कहा,
"अब... पूरा हो गया।"
राहुल का शरीर जमीन पर गिरा।
सांसें रुक गईं।
प्रिया रो पड़ी।
"नहीं... भाई!"
चंद्रपाल ने मंत्र बंद किए।
धुंध धीरे-धीरे छंटी।
शव फिर शांत हो गया।
विक्रम कांपते हुए बोला,
"वो... चला गया। आत्मा ने ले लिया।"
प्रिया वहीं जमीन पर बैठ गई।
राहुल का शरीर ठंडा हो चुका था।
वो उसके हाथ को छूकर रोती रही।
"भाई... क्यों?"
लेकिन कोई जवाब नहीं।
सिर्फ हवा की सरसराहट।
वो जानती थी—ये सब खत्म हो गया।
आत्मा ने राहुल को ले लिया।
प्रिया उठी।
वो चंद्रपाल और विक्रम को देखकर बोली,
"ये सब कभी नहीं भूलूंगी।"
वो कार में बैठी और दिल्ली लौट आई।
कहानी यहीं खत्म होती है।
दोस्तों, ये कहानी हमें सिखाती है कि ऐसी अंधेरी शक्तियों से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।
कभी-कभी उत्सुकता इंसान को ऐसी जगह ले जाती है जहां से लौटना नामुमकिन होता है।
ऐसी ताकतों को जगाना आसान है, लेकिन उन्हें बंद करना बहुत मुश्किल।
अगर आप भी कभी ऐसी जगहों के बारे में सोचते हैं, तो याद रखिए—कुछ रहस्य रहने ही चाहिए।
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कमेंट में बताइए—क्या आप ऐसी श्मशान साधना कभी ट्राई करना चाहेंगे?
या ये सब सिर्फ कहानियां हैं?
आपके कमेंट्स का इंतजार रहेगा।
धन्यवाद! 😱🖤