श्री कृष्ण कहते हैं... अब मैं तुम्हें उस अंतिम सत्य के पास ले चलता हूँ, जिसकी खोज में जाने-अनजाने हर मनुष्य जीवन भर भटकता रहता है। तुमने करियर को सफलता समझ लिया, सफलता को सम्मान समझ लिया और सम्मान को सुख समझ लिया। लेकिन क्या तुमने कभी उन लोगों को नहीं देखा जिनके पास बड़ा पद है, धन है, नाम है, फिर भी उनके चेहरे पर शांति नहीं है? यदि केवल करियर ही सुख देता, तो सफल लोगों के जीवन में बेचैनी क्यों होती? यदि केवल धन ही सुरक्षा देता, तो धनवान लोग भी भविष्य से क्यों डरते? यदि केवल प्रसिद्धि ही संतोष देती, तो प्रसिद्ध लोग भी अकेलापन क्यों महसूस करते? इसका कारण यह है कि मन की शांति बाहर की उपलब्धियों से नहीं, भीतर की स्थिति से जन्म लेती है। करियर आवश्यक है, क्योंकि वह तुम्हें कर्म करने का अवसर देता है। धन भी आवश्यक है, क्योंकि उससे जीवन की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। सम्मान भी अच्छा है, क्योंकि वह तुम्हारे सद्कर्मों का परिणाम हो सकता है। लेकिन यदि तुम इन सबको अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य बना लोगे, तो एक चिंता समाप्त होते ही दूसरी चिंता जन्म ले लेगी। पहले तुम नौकरी के लिए चिंतित थे। फिर नौकरी मिलने के बाद पदोन्नति की चिंता होगी। फिर अधिक वेतन की चिंता होगी। फिर अपने स्थान को बचाने की चिंता होगी। फिर दूसरों से आगे बने रहने की चिंता होगी। यदि मन की आदत चिंता करना है, तो कारण बदलते रहेंगे, चिंता नहीं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम कारणों को नहीं, अपने मन को बदलो। एक वृद्ध व्यक्ति अपने छोटे-से घर में रहता था। उसके पास बहुत अधिक धन नहीं था। लेकिन वह हर सुबह मुस्कुराकर उठता, अपने काम पर जाता और शाम को संतोष के साथ लौटता। एक दिन किसी ने उससे पूछा, "आपके पास इतना कम है, फिर भी आप इतने शांत कैसे रहते हैं?" वह मुस्कुराकर बोला, "मैं हर दिन यह नहीं गिनता कि मेरे पास क्या नहीं है। मैं यह देखता हूँ कि आज मुझे क्या करने का अवसर मिला।" यही दृष्टि जीवन बदल देती है। जिस दिन तुम अभाव गिनना छोड़कर अवसर गिनना शुरू कर दोगे, उसी दिन तुम्हारा मन हल्का होने लगेगा। आज का मनुष्य भविष्य के लिए इतना चिंतित है कि वर्तमान को जीना भूल गया है। वह सोचता है कि जब अच्छी नौकरी मिलेगी तब खुश रहूँगा। जब बड़ा घर होगा तब शांत रहूँगा। जब लोग मेरी प्रशंसा करेंगे तब संतुष्ट रहूँगा। लेकिन ऐसा दिन कभी नहीं आता। क्योंकि जिसने आज खुशी को टाल दिया, वह कल भी उसे किसी और कारण से टाल देगा। सच्ची शांति भविष्य में नहीं मिलती। वह वर्तमान के सही कर्म में मिलती है। जब तुम पूरे मन से अपना कर्तव्य निभाते हो, तब रात को सोते समय तुम्हारे भीतर एक संतोष होता है। हो सकता है परिणाम अभी न मिला हो। लेकिन तुम्हारा मन यह जानता है कि तुमने अपनी पूरी ईमानदारी से प्रयास किया। यही संतोष तुम्हें अगले दिन फिर से खड़ा करता है। एक युवक कई वर्षों तक नौकरी की तलाश करता रहा। उसे कई बार असफलता मिली। लेकिन उसने अपने दिन को केवल परिणाम से नहीं आँका। हर शाम वह स्वयं से तीन प्रश्न पूछता था। क्या मैंने आज कुछ नया सीखा? क्या मैंने आज अपना प्रयास पूरी ईमानदारी से किया? क्या मैं कल आज से थोड़ा बेहतर बन सकता हूँ? इन तीन प्रश्नों ने उसके भीतर ऐसी स्थिरता पैदा कर दी कि असफलताएँ भी उसे तोड़ नहीं सकीं। कुछ समय बाद उसे अवसर मिला। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि उस समय तक वह भीतर से बदल चुका था। यदि अवसर पहले मिल जाता, तो शायद वह उतना परिपक्व नहीं होता। समझो, कई बार जीवन तुम्हें देर इसलिए नहीं देता कि वह तुम्हें रोकना चाहता है। वह देर इसलिए देता है क्योंकि वह तुम्हें उस सफलता के योग्य बना रहा होता है जिसे संभालने के लिए तुम्हें अभी और मजबूत होना है। इसलिए प्रतीक्षा को दंड मत समझो। उसे तैयारी का समय समझो। तुम्हें यह भी याद रखना होगा कि हर व्यक्ति का मार्ग अलग है। यदि किसी और को जल्दी सफलता मिली है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हारा समय निकल गया। आकाश में उगने वाले सभी तारे एक ही समय पर दिखाई नहीं देते। फूल भी एक ही दिन नहीं खिलते। ऋतुएँ भी एक साथ नहीं आतीं। फिर तुम अपने जीवन से यह अपेक्षा क्यों करते हो कि सब कुछ उसी समय हो, जिस समय तुम चाहते हो? धैर्य केवल इंतज़ार करने का नाम नहीं है। धैर्य का अर्थ है—इंतज़ार करते हुए भी अपने कर्म को नहीं छोड़ना। यही वह शक्ति है जो साधारण मनुष्य को असाधारण बना देती है। जब भी तुम्हारे मन में करियर को लेकर डर आए, तो स्वयं से कहना— मैं अपना भविष्य चिंता से नहीं, अपने कर्म से बनाऊँगा। मैं तुलना नहीं करूँगा। मैं अपने समय का सम्मान करूँगा। मैं हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ूँगा। मैं असफलता से नहीं भागूँगा। मैं सफलता पर घमंड नहीं करूँगा। मैं सीखना कभी नहीं छोड़ूँगा। और सबसे महत्वपूर्ण— मैं अपने मूल्य को अपने पद, वेतन या पहचान से नहीं जोड़ूँगा। क्योंकि मेरा वास्तविक मूल्य मेरे चरित्र, मेरे धैर्य, मेरी ईमानदारी और मेरे कर्म में है। याद रखो, जब मन शांत होता है, तब निर्णय सही होते हैं। जब निर्णय सही होते हैं, तब कर्म मजबूत होते हैं। जब कर्म मजबूत होते हैं, तब समय भी तुम्हारा साथ देने लगता है। इसलिए करियर की चिंता छोड़ो, लेकिन करियर के लिए कर्म करना मत छोड़ो। भविष्य की चिंता छोड़ो, लेकिन भविष्य की तैयारी करना मत छोड़ो। दूसरों से तुलना छोड़ो, लेकिन स्वयं को बेहतर बनाना मत छोड़ो। और सबसे बढ़कर... अपने भीतर बैठे उस विश्वास को कभी मत छोड़ो, जो हर कठिन समय में तुम्हें यह याद दिलाता है कि तुम्हारा जीवन किसी एक परीक्षा, किसी एक नौकरी, किसी एक असफलता या किसी एक सफलता से तय नहीं होता। तुम्हारा जीवन हर उस क्षण से बनता है, जब तुम भय के स्थान पर विश्वास चुनते हो... निराशा के स्थान पर धैर्य चुनते हो... और चिंता के स्थान पर अपना सच्चा कर्म चुनते हो। जब तुम ऐसा करना सीख जाते हो, तब करियर तुम्हारे जीवन का स्वामी नहीं रहता, वह केवल तुम्हारे कर्म का एक सुंदर परिणाम बन जाता है। और उसी दिन तुम्हारा मन पहली बार सच्चे अर्थों में स्वतंत्र हो जाता है। मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ। जब भी तुम्हारा मन डगमगाए, अपने भीतर की शांति में लौट आना। वहीं तुम्हें साहस मिलेगा, वहीं तुम्हें दिशा मिलेगी, और वहीं तुम्हें यह अनुभव होगा कि जिसने अपने कर्म को ईमानदारी से अपना लिया, उसके लिए कोई भी मार्ग असंभव नहीं रहता। जय श्री कृष्ण।