diksha
diksha kumari에 의해सावन का महीना था। हर तरफ हरियाली, बारिश और भगवान शिव की भक्ति का उत्सव छाया हुआ था। गांव का हर छोटा-बड़ा शिव मंदिर श्रद्धालुओं से भरा हुआ था। इसी गांव में रहता था एक गरीब किसान – रामू।
रामू भोलेनाथ का बहुत बड़ा भक्त था। हर सोमवार को उपवास रखता, मंदिर जाकर बेलपत्र और जल अर्पित करता। लेकिन इस सावन उसके पास मंदिर जाने के लिए कुछ नहीं था – न बेलपत्र, न फूल, न दूध। खेत में फसल खराब हो गई थी और घर में अनाज का भी संकट था।
रामू दुखी मन से घर के कोने में बैठा रो रहा था। उसने आसमान की ओर देखा और कहा,
“हे भोलेनाथ, क्या मेरी भक्ति इतनी कमजोर थी कि आज मैं खाली हाथ रह गया?”
उसी रात रामू को सपना आया। सपने में भगवान शिव प्रकट हुए। मुस्कराते हुए बोले,
“रामू, भक्ति चीजों से नहीं, भाव से होती है।”
अगली सुबह रामू उठा और मन में निश्चय किया – “चाहे कुछ भी हो, मैं आज भोलेनाथ के दर्शन ज़रूर करूंगा।”
वह पास के जंगल में गया, एक सूखा बेलपत्र का पेड़ देखा। उसके नीचे से कुछ सूखे बेलपत्र उठाए। घर लौटकर एक मिट्टी की कटोरी में कुएं का जल भर लिया और मंदिर की ओर निकल पड़ा।
मंदिर पहुंचकर वह बोला,
“हे भोलेनाथ, मेरे पास कुछ नहीं, पर जो भी है, सच्चे मन से लाया हूँ। कृपा करना।”
जैसे ही उसने जल और बेलपत्र चढ़ाया, मंदिर में तेज़ रौशनी फैली और पुजारी ने देखा कि शिवलिंग पर सचमुच दूध की धारा बह रही है। सब चौंक गए।
पुजारी ने रामू से पूछा,
“तुमने क्या चढ़ाया?”
रामू बोला,
“सिर्फ जल और कुछ सूखे बेलपत्र।”
पुजारी मुस्कराए और बोले,
“यह भोलेनाथ की लीला है। जब भक्ति सच्ची हो, तो भगवान खुद सब कुछ बना देते हैं।”
उस दिन से गांव में रामू को “भोले का सच्चा भक्त” कहा जाने लगा।
सीख:
भगवान को भौतिक चीजें नहीं, भाव और निष्ठा प्रिय हैं। सावन का महीना सिर्फ पूजा का नहीं, अपने भीतर की सच्चाई और श्रद्धा को जगाने का समय है।