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Chandan Kumar에 의해जीवन किसी से छिपा नहीं है। हम ही उससे आंखें मूंदे बैठे हैं। हर क्षण सत्य हमारे दरवाजे पर दस्तक देता है। पर हम व्यस्त हैं अपनी इच्छाओं के शोर में। हम भाग रहे हैं निरंतर बिना जाने के कहां पहुंचना है। हम बदलना चाहते हैं दुनिया को, लोगों को, परिस्थितियों को और सबसे अधिक स्वयं को। पर इस निरंतर दौड़ में हमने भूल गया है कि जीवन बदलने की नहीं समझने की चीज है। समझ तब आती है जब मन शांत होता है और मन तब शांत होता है जब तुम स्वीकार करना सीखते हो। स्वीकार का अर्थ है जो है उसे होने देना। बिना विरोध, बिना निर्णय, बिना चाह। यह साधारण सा लगता है पर यही सबसे कठिन साधना है क्योंकि हमारा मन विरोध से बना है। मन की हर परत में एक अस्वीकार छिपा है। यह ऐसा नहीं होना चाहिए था। यह गलत है। इसे बदलना चाहिए और जब तक यह अस्वीकार भीतर है तब तक जीवन की लहरें तुम्हारे विरुद्ध बहती रहेंगी। अहंकार उसी अस्वीकार से जन्म लेता है। अहंकार केवल मैं श्रेष्ठ हूं नहीं है। अहंकार यह भी है कि मुझे पता है कि क्या होना चाहिए। यहां तक कि जब हम कहते हैं मैं अच्छा इंसान हूं तो भी उसमें एक सूक्ष्म अहंकार छिपा होता है। क्योंकि अच्छा और बुरा का भेद भी अहंकार की दृष्टि से आता है। जीवन में जो घट रहा है वह ना अच्छा है ना बुरा वह केवल है। जब तुम यह देख लेते हो कि हर अनुभव, हर घटना, हर भावना अपने स्थान पर पूर्ण है, तब एक गहरी सहजता तुम्हारे भीतर उतरती है। तब तुम देख पाते हो कि तुम्हारा संघर्ष व्यर्थ था। मन हमेशा कहता है यह वैसा क्यों हुआ? और अस्तित्व कहता है क्यों नहीं? जिस क्षण तुम अस्तित्व से प्रश्न पूछना बंद कर देते हो उसी क्षण तुम्हें उत्तर मिलना शुरू हो जाता है। क्योंकि जीवन प्रश्नों से नहीं मौन से खुलता है। तुम जितना प्रतिरोध करते हो उतना ही द्वार बंद होता जाता है। और जब तुम कहते हो हां जो है वही ठीक है। तो द्वार खुल जाता है। और भीतर से एक शांति की लहर तुम्हें छू जाती है। स्वीकार युद्ध का अंत है। यह हार नहीं है। यह समझ है कि युद्ध कभी जीता ही नहीं जा सकता। क्योंकि लड़ने वाला और जिससे लड़ाई है, दोनों एक ही है। तुम स्वयं ही अपने विरोधी हो। जैसे ही तुम यह देख लेते हो भीतर कुछ ढहता है। वह दीवार जो तुम्हें तुमसे अलग करती थी टूट जाती है और वहां से एक नया जीवन शुरू होता है। जहां तुम चीजों को बदलने की कोशिश नहीं करते बल्कि उन्हें देखना सीखते हो। देखना ही ध्यान है। जब तुम बिना निर्णय के देखते हो तो देखने वाला और देखा जाने वाला एक हो जाते हैं। वह एकता ही ध्यान की अवस्था है। वह मौन, वह स्थिरता, वह शांत जल की तरह गहराई वहीं से आत्मा का गीत शुरू होता है। तुम्हें अब कुछ पाने की चाह नहीं रहती। तुम बस जो है उसमें डूब जाते हो और वहीं से समर्पण की सुगंध उठती है। समर्पण कोई कर्तव्य नहीं, कोई निर्णय नहीं। यह एक घटना है। जब भीतर का प्रतिरोध मिटता है तो समर्पण स्वयं घटता है। यह ऐसा है जैसे बरसात के बादल खुद बिखर जाते हैं। तुम कुछ करते नहीं बस देखते हो और देखना ही समर्पण बन जाता है। समर्पण में कोई झुकता नहीं क्योंकि झुकने वाला भी चला जाता है। वहां केवल मौन बचता है। केवल अस्तित्व की धड़कन वहीं प्रेम जन्म लेता है। वही शांति का स्रोत है। जो समर्पित होता है, वह अब निर्णय नहीं करता। वह अब यह सही है या गलत नहीं सोचता। वह जानता है कि जो घट रहा है, वही सही है। वह जीवन के साथ बहता है, जीवन के विरुद्ध नहीं। वह नदी की तरह हो जाता है। जिसे पता है कि सागर तक पहुंचना निश्चित है। इसलिए वह हर मोड़, हर पत्थर, हर गिरावट को भी स्वीकार करती है। वह रुकती नहीं, वह शिकायत नहीं करती। वह बस बहती है सहज मौन गहराई में। तुम भी जब यह सीखते हो कि जीवन की दिशा तुम्हारे हाथ में नहीं है, तब पहली बार तुम विश्राम करते हो। फिर तुम्हें कुछ सिद्ध करने की जरूरत नहीं रहती। फिर तुम किसी से तुलना नहीं करते क्योंकि तुलना वहीं होती है जहां अहंकार है। स्वीकार में कोई तुलना नहीं, कोई दौड़ नहीं, कोई मंजिल नहीं। बस हर क्षण एक नया फूल खिलता है और तुम उसे देख मुस्कुरा देते हो। पर मन कहता है यह आसान नहीं है। और हां, यह आसान नहीं। क्योंकि मन को खोना सरल नहीं। मन ने वर्षों से तुम्हें विश्वास दिलाया है कि तुम कुछ विशेष हो कि तुम्हें कुछ पाना है, कुछ बनना है, कुछ साबित करना है। लेकिन जो वास्तव में जाग जाता है, वह जानता है कि कुछ भी पाने को नहीं है। क्योंकि सब पहले से ही है। जो खोजते हैं, वे रास्ते में है, जो स्वीकार करते हैं। वे पहुंच चुके हैं। कभी अपने भीतर झांको। तुम्हारा हर दोहक, हर तनाव, हर पीड़ा किसी अस्वीकार से ही पैदा हुआ है। तुम किसी बात को, किसी व्यक्ति को या स्वयं को नहीं कह रहे हो। और जब तक यह नहीं भीतर है तब तक शांति तुम्हारे पास नहीं आ सकती। शांति तभी आती है जब तुम कहते हो हां। यह हां किसी बात के लिए नहीं। यह हां जीवन के लिए है, अस्तित्व के लिए है। वह हां जब भीतर से निकलती है तो सारी सीमाएं टूट जाती है। तब तुम्हें लगता है मैं अब कुछ नहीं हूं और इसी में सब कुछ हूं। तुम अब लहर नहीं रहे तुम सागर हो गए हो। फिर मृत्यु का भय नहीं रहता। क्योंकि जिसने समर्पण किया है उसके लिए मृत्यु भी केवल एक रूपांतरण है। वह जानता है लहर मिटती नहीं। वह बस सागर में लौटती है और वह लौटना ही परम विश्राम है। जो इस सत्य को समझता है, वह अब अपने जीवन को नियंत्रित नहीं करना चाहता। वह बस उसे देखता है। जैसे कोई बादलों के बदलते आकार देखता है। हर आकार आता है, कुछ पल रहता है और चला जाता है। पर आकाश वही रहता है। तुम्हारा अस्तित्व भी वही है। घटनाएं आती जाती हैं, पर तुम साक्षी बने रहते हो। साक्षी होना ही स्वीकार का शिखर है। जरा ठहरो। सांस की लय को महसूस करो। भीतर कहीं गहराई में कुछ शांत हो रहा है। जैसे कोई लहर समंदर में लौट रही हो। जीवन को समझने का पहला द्वार है स्वीकार। लेकिन हम जीते ऐसे हैं। मानो हमें हर चीज बदलनी हो। हम हर क्षण संघर्ष में हैं परिस्थितियों से, लोगों से और सबसे गहरा संघर्ष स्वयं से। हम हमेशा कुछ और होना चाहते हैं। जो हैं उसे स्वीकार करना हमें कठिन लगता है। पर सत्य यह है कि जब तक तुम स्वयं को स्वीकार नहीं करते तब तक तुम जीवन को जान नहीं सकते। क्योंकि जीवन तुम्हारे बाहर नहीं तुम्हारे भीतर ही धड़क रहा है। स्वीकार का अर्थ यह नहीं कि तुम हार मान लो। स्वीकार का अर्थ है जो है उसे देखने की क्षमता है। जैसे तुम किसी झील के किनारे बैठो और उसमें उठती लहरों को बिना नाम दिए बिना निर्णय किए बस देखते रहो। ना लहरें गलत है ना शांत जल सही। दोनों उसी झील के रूप हैं। मन हमेशा दो हिस्सों में बंटा रहता है। वह चाहता है कि अच्छा बने और जो बुरा लगता है उसे दूर कर दे। लेकिन जीवन द्वंद से नहीं पूर्णता से चलता है। दिन के बिना रात नहीं, मृत्यु के बिना जीवन नहीं, दोहक के बिना आनंद नहीं। जो इन दोनों को स्वीकार करता है। वह द्वार देखता है जहां से अस्तित्व स्वयं प्रकट होता है। स्वीकार वही नहीं जो समर्पण है। स्वीकार शुरुआत है। समर्पण उसकी पराकाष्ठा। स्वीकार तब होता है जब तुम कहते हो। हां जो है वही सत्य है और समर्पण तब होता है जब तुम कहते हो। अब मैं ही नहीं हूं केवल सत्य है। लेकिन यहां एक दीवार है अहंकार। अहंकार हमेशा कहता है। मैं सही हूं। मैं अलग हूं मैं जानता हूं। और यही दीवार तुम्हें जीवन से अलग कर देती है। अहंकार चाहता है नियंत्रण। जबकि जीवन नियंत्रण से नहीं भाव से चलता है। तुम जितना रोकते हो उतना टूटते हो। तुम जितना छोड़ते हो उतना जुड़ते हो। जब तुम जीवन को स्वीकारते हो अहंकार हिलने लगता है क्योंकि अहंकार का अस्तित्व विरोध पर टिका है। वह कहता है मुझे कुछ बनना है और जब तुम कहते हो मैं जो हूं वही पर्याप्त है। तो अहंकार मरने लगता है। लेकिन यही उसकी मृत्यु तुम्हारा जन्म है। समझो। स्वीकार कोई विचार नहीं। यह एक अनुभव है। यह मन से नहीं चेतना से होता है। जब तुम किसी स्थिति को बिना निर्णय के देखते हो तो देखने वाला और देखी जाने वाली स्थिति एक हो जाती है। वहां द्वंद नहीं बचता। वहां केवल मौन है। वह मौन ही समर्पण है। समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम किसी के आगे झुको। समर्पण का अर्थ है अब कोई मैं बचा ही नहीं जो झुके। वह अदृश्यता की अवस्था है। जहां तुम बहते हो, जैसे हवा बहती है, जैसे नदी बहती है अपने सागर की ओर। जो समर्पित होता है, वह अब चुनाव नहीं करता क्योंकि चुनाव हमेशा विभाजन लाता है। समर्पण में ना यह ना वह। सिर्फ एक मौन स्वीकृति है। जैसे गुलाब बिना कारण खिलता है। वैसे ही तुम्हारा अस्तित्व बिना कारण धड़कता है। पर मन कहेगा यह बहुत कठिन है। और हां यह कठिन है क्योंकि मन को खोना आसान नहीं। अहंकार ने तुम्हें वर्षों तक यह विश्वास दिलाया है कि तुम अलग हो, श्रेष्ठ हो या कुछ बनना बाकी है। लेकिन जब तुम गहराई में उतरते हो तो तुम्हें पता चलता है कि तुम स्वयं ही बाधा हो। तुम स्वयं ही संघर्ष हो और जब यह समझ पूरी तरह उतरती है तो अहंकार स्वाभाविक रूप से मिट जाता है। समर्पण कोई कर्म नहीं यह एक घटना है। यह तब घटती है जब तुम भीतर से थक जाते हो। जब सब प्रयास बेकार लगने लगते हैं। जब तुम देखते हो कि ना बदलने से दोहक है और बदलने की चाह से भी दोहक है। तब तुम बस रुक जाते हो। उस रुकने में, उस ठहराव में समर्पण खिलता है। और जब समर्पण आता है तो तुम में कुछ नहीं बचता। केवल शांति। तुम पाते हो कि अब तुम नहीं हो पर सब कुछ है। तुम लहर नहीं रहे। तुम सागर हो गए हो। कभी सोचा है क्यों हमें जो है वह अधूरा लगता है। क्यों हमें लगता है कि कुछ और चाहिए। कुछ बदलना चाहिए। कि यह क्षण पर्याप्त नहीं है? यही तो है मन की सबसे पुरानी चाल। वह हमेशा कहता है यह नहीं कुछ और। और इसी कुछ और की खोज में तुम जीवन से अपने वर्तमान से अपनी आत्मा से दूर चले जाते हो। देखो जरा जब तुम किसी बात से असहमत होते हो तब भीतर कितनी बेचैनी होती है। वह बेचैनी तुम्हारे बाहर से नहीं आती। वह तुम्हारे प्रतिरोध से आती है। जितना तुम किसी बात का विरोध करते हो, उतनी ही वह बात तुम्हारे भीतर जड़ पकड़ती जाती है। जीवन को जीतना नहीं है। जीवन को समझना है और समझ केवल तब आती है जब तुम विरोध छोड़ देते हो। क्योंकि विरोध में ऊर्जा टूटती है। स्वीकार में ऊर्जा एकत्र होती है। विरोध तुम्हें बांटता है। स्वीकार तुम्हें जोड़ता है। जब तुम स्वीकार करते हो तो अचानक तुम देखते हो जिससे तुम डरते थे। वह तुम्हें बदलने नहीं आया था। वह तो तुम्हें दिखाने आया था कि तुम कौन हो। हर पीड़ा, हर असफलता, हर अपमान, जीवन का शिक्षक है। वह तुम्हें चोट देने नहीं आया। वह तुम्हें भीतर झांकने आया है। लेकिन अहंकार इसे स्वीकार नहीं कर सकता। क्योंकि अहंकार का अस्तित्व मैं सही हूं पर टिका है। अगर वह मान ले कि गलती उसी की है तो उसका ढांचा टूट जाएगा। इसलिए वह हमेशा दूसरों को दोष देता है। परिस्थितियों को दोष देता है। कभी भाग्य को कभी समय को। पर यह सब केवल बचाव है। अहंकार को बचाने के लिए बनाए गए तर्क। तुम्हें समझना होगा अहंकार कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। वह केवल एक छाया है जो तुम्हारे अस्वीकार से बनी है। जितना तुम अस्वीकार करते हो उतनी छाया गहरी होती जाती है। और जब तुम स्वीकार करते हो वह छाया मिट जाती है क्योंकि उसे अब कोई आधार नहीं मिलता। जीवन बहुत सरल है लेकिन हमारा मन उसे जटिल बना देता है। हम सोचते हैं सत्य बहुत कठिन है लेकिन कठिनाई सत्य में नहीं हमारे प्रतिरोध में है। जिस दिन तुमने प्रतिरोध छोड़ा सत्य उसी दिन खुल जाता है। यह मानो जैसे कोई खिड़की खोल दो। हवा पहले से थी। सूरज पहले से था। बस दीवारें थी तुम्हारे भीतर। अब हवा आ गई। अब रोशनी भर गई। पर यह हवा आई नहीं। यह तो हमेशा थी। स्वीकार वही खिड़की है। जैसे ही तुम स्वीकारते हो, जीवन का प्रवाह भीतर उतर आता है। तुम्हारे भीतर मौन उतरता है और वह मौन किसी साधना से नहीं आता। वह तो सदैव वहां था। तुम्हारे अस्वीकार ने उसे ढंग रखा था। कभी ध्यान से देखो। जब तुम किसी से प्रेम करते हो, क्या