Horror story
بواسطة Ayaan Razaसाल 2019। गर्मी अपने पूरे जोश पर थी। बिहार के एक छोटे से गाँव ‘सरैया’ में 19 वर्षीय अथर्व अपने पुराने मकान की छत पर बैठा, दूर शहरों की चमकती रौशनी की कल्पना कर रहा था। उसका मन गांव की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुका था। वो पढ़ा-लिखा था, होशियार था, लेकिन गांव में कोई अवसर नहीं था। दिल में बड़े सपने थे — एक नई ज़िंदगी, नई शुरुआत की चाह।
उसकी माँ की तबीयत लंबे समय से ठीक नहीं थी। पिता पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। एक दिन गांव के ही एक जानने वाले ने बताया कि मुंबई में एक अमीर परिवार को घर का देखरेख करने वाला एक लड़का चाहिए। काम सीधा-सादा है, और पैसे भी ठीक मिलेंगे।
अथर्व ने ज़्यादा सोचा नहीं। माँ की दवाइयों, घर की ज़िम्मेदारी और अपने सपनों को पूरा करने के इरादे से, उसने बैग पैक किया और पहली बार गांव से बाहर निकल गया — मुंबई की ओर।
मुंबई — जहाँ हर कोई कुछ न कुछ खोकर कुछ पाना चाहता है।
जब अथर्व CST स्टेशन पर उतरा, तो वो भीड़, शोर और अजनबियों की ज़िंदगी से घिर गया था। कुछ देर के लिए तो उसे घबराहट हुई, लेकिन दिल में उम्मीद का उजाला था।
तीन घंटे के बाद, वो एक पुरानी सी टैक्सी में बैठकर शहर के किनारे बसे एक पुराने बंगले के सामने पहुंचा — "वृंदावन विला"।
बंगला बहुत बड़ा था, लेकिन अजीब तरह से शांत और सुनसान। चारों ओर ऊँची दीवारें थीं और पेड़ों की शाखाएँ दीवारों से बाहर झांक रही थीं। बंगले के दरवाज़े पर लोहे की जंजीर लटक रही थी, जिस पर हल्का ज़ंग लगा था।
गेट पर दस्तक दी, तो एक अधेड़ उम्र का चौकीदार निकला, नाम था रघुवीर।
रघुवीर ने ऊपर से नीचे तक अथर्व को देखा और कहा,
“तू ही है नया लड़का? चल अंदर... मालिकन तुझसे मिलेंगी।”
अथर्व ने हाँ में सिर हिलाया और बंगले के भीतर चला गया। बंगले का माहौल बहुत ठंडा था, जैसे वहाँ धूप भी डर-डर के आती हो।
कुछ ही देर में एक धीमी सी आवाज़ गूंजी...
“आ जाओ...”
वो आवाज़ अंदर से आई थी — न ज़्यादा कोमल, न ज़्यादा कठोर — लेकिन कुछ था उसमें... जो दिल को चीरता चला गया।
अथर्व ने जैसे ही उस कमरे का दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें ठहर गईं।
सामने खड़ी थी एक औरत — काली साड़ी, खुले लंबे बाल, और चेहरे पर एक अजीब सी रहस्यमयी मुस्कान। उम्र कोई 28-30 की रही होगी, लेकिन आंखों में जैसे सदियों का सन्नाटा था।
“मैं माया हूँ...” उसने कहा।
...और तभी दीवार की घड़ी की सुइयों ने आधी रात का घंटा बजाया।
टिक... टिक... टिक...
कुछ तो था इस औरत में... कुछ ऐसा जो अथर्व की रूह को छू गया... और शायद उसकी रूह को भी।अथर्व कुछ पल के लिए वहीं ठिठक गया। माया की आंखों में ऐसा आकर्षण था जैसे वो उसे अपने भीतर खींच रही हो। उसकी आवाज़ धीमी लेकिन गूंजती हुई सी थी — जैसे किसी खाली कमरे में बोलने पर लौटती है।
“तुम्हारा नाम?” माया ने पूछा।
“अथर्व... जी,” उसने हल्के स्वर में जवाब दिया।
माया मुस्कराई — एक रहस्यमयी मुस्कान जो न सच्ची लगती थी, न झूठी।
“ये बंगला अब तुम्हारा भी घर है, लेकिन कुछ नियम हैं...”
उसकी आवाज़ अचानक ठंडी हो गई।
“एक — बंगले की तीसरी मंज़िल पर कभी मत जाना।
दो — हर रात 12 बजे के बाद कमरे से बाहर मत निकलना।
तीन — कुछ भी दिखे, कुछ भी सुनाई दे... अनदेखा करना सीखो।”
अथर्व चौंका, लेकिन कुछ पूछ नहीं सका। उसे रहने को पीछे का एक कमरा मिला — साधारण सा, लेकिन काफी साफ़-सुथरा। माया ने उसे वही कमरा दिखाया और बिना कुछ कहे चली गई।
रात का समय...
घड़ी ने जैसे ही 12 बजाए, अचानक कमरे में हल्की सी सरसराहट की आवाज़ आई। खिड़की के पर्दे बिना हवा के ही हिलने लगे। एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे कोई परछाईं दीवार पर चल रही हो। अथर्व डर गया, लेकिन माया की कही बात याद आई — “कुछ भी दिखे... अनदेखा करना सीखो।”
वो चुपचाप बिस्तर पर लेट गया।
अगले दिन...
अथर्व ने घर का काम संभालना शुरू किया — सफ़ाई, सामान का ख्याल, रसोई का देखना। लेकिन सबसे अजीब बात ये थी कि पूरे बंगले में और कोई नहीं था। ना नौकर, ना कोई और। बस माया... और रघुवीर चौकीदार।
धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि माया की दिनचर्या बेहद अजीब है। वो दिन में ज़्यादातर सोती रहती थी, और रात में अकेले बाहर टहलती। कभी-कभी छत से किसी के गाने की धीमी आवाज़ आती — जैसे कोई पुरानी लोरी गा रहा हो। और फिर... कभी-कभी हल्की सी रोने की।
एक दिन अथर्व ने हिम्मत करके रघुवीर से पूछा,
“ये माया जी... क्या हमेशा ऐसी ही थीं?”
रघुवीर ने सिर झुका लिया। कुछ देर चुप रहने के बाद बोला,
“मालिकन बहुत अच्छी थीं कभी... लेकिन 6 साल पहले कुछ हुआ... तब से ये घर भी बदल गया, और माया जी भी।”
“क्या हुआ था?” अथर्व ने धीरे से पूछा।
रघुवीर ने बस इतना कहा —
“वो कहानी मत सुनो बेटा... जो अधूरी हो... और खून से लथपथ।”
अथर्व का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। ये बंगला, ये औरत, ये नियम... और अब अधूरी खून की कहानी।
कुछ तो था यहाँ, जो बहुत गहरा और डरावना था।
उसी रात...
जब घड़ी ने फिर से 12 बजाए...
अथर्व की खिड़की के पास से किसी लड़की की हँसी की आवाज़ आई।
...और किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
रात के ठीक 12 बजे।
अथर्व की आंखें अपने आप खुल गईं — जैसे किसी ने उसे झकझोर कर उठाया हो। कमरे की खामोशी अब डरावनी लगने लगी थी। दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक अब उसके कानों में तेज़ गूंज रही थी।
खटखट… खटखट…
फिर वही आवाज़। दरवाज़े पर किसी ने हल्के से दस्तक दी।
अथर्व की सांसें रुक सी गईं। उसने माया की बात याद की — “रात 12 बजे के बाद कभी बाहर मत निकलना…”
पर जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।
उसने धीरे से दरवाज़े की दरार से झांका।
...कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे — मानो कोई बाथरूम से आया हो… पर वो निशान कमरे की ओर नहीं, बल्कि सीढ़ियों की ओर जाते थे… तीसरी मंज़िल की ओर।
अब तक अथर्व को साफ़ लगने लगा था कि माया कुछ छुपा रही है। अगले दिन उसने पूरे बंगले का मुआयना करना शुरू कर दिया। लेकिन तीसरी मंज़िल तक जाने वाली सीढ़ियों पर एक मोटा लाल कपड़ा टांगा हुआ था — जैसे जानबूझकर नज़रों से छुपाया गया हो।
रघुवीर फिर टोकने आया,
“उधर मत जाना बेटा… वहाँ सिर्फ़ सन्नाटा नहीं, साया भी है।”
“किसका साया?” अथर्व ने पूछा।
रघुवीर ने कांपती आवाज़ में कहा,
“माया जी की जुड़वां बहन का। जिसकी मौत यहीं… तीसरी मंज़िल पर हुई थी। छह साल पहले।”
अथर्व स्तब्ध रह गया।
“तो फिर वो हँसी… वो रोने की आवाज़ें?”
रघुवीर ने गर्दन झुका ली।
“कुछ आत्माएं… जाने नहीं देतीं, और कुछ रुकना चाहती हैं… हमेशा के लिए।”
उसी रात…
अथर्व ने हिम्मत जुटाई।
जब सब सो गए, वो चुपचाप तीसरी मंज़िल की ओर बढ़ा।
सीढ़ियों पर चढ़ते ही ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया। जैसे किसी ने आह भरी हो। दीवारों पर धूल की परतें थीं, लेकिन बीच में एक दरवाज़ा चमक रहा था — नया, लाल रंग का।
उसने दरवाज़ा खोला…
कमरे के बीचोंबीच एक शीशा था। और उस शीशे में... वो खुद नहीं, कोई और दिख रही थी — बिलकुल माया जैसी। पर आंखें खून से लाल।
अथर्व ने पीछे मुड़कर देखा — कोई नहीं।
फिर अचानक...
शीशे की माया मुस्कराई — और बोली, “मुझे आज़ाद करो…”
...और शीशे की सतह से एक हाथ बाहर निकला, जैसे कोई उसमें से बाहर आने की कोशिश कर रहा हो।
अथर्व के हाथ में वह कटा हुआ शीशा था, और उसे धीरे-धीरे महसूस हुआ कि उस शीशे में कुछ असाधारण था।
शीशे से निकलते हुए उस हाथ ने उसे अपनी ओर खींचने की कोशिश की, लेकिन वह डरकर पीछे हट गया।
“मुझे आज़ाद करो…” वह आवाज़ फिर से गूंजने लगी थी, पर अब उसे कोई डर नहीं लग रहा था। वह इस रहस्य को सुलझाने के लिए तैयार था, चाहे जो हो।
अथर्व ने शीशे के पास कदम बढ़ाए और उसकी सतह पर हाथ रखा। जैसे ही उसका हाथ शीशे पर पड़ा, अचानक उसके चारों ओर अजीब सी हवा चलने लगी, और कमरे में हल्की सी रोशनी फैल गई। जैसे ही उसने पूरी ताकत से शीशे को खींचा, उसके अंदर से एक धुंधली सी आकृति बाहर आ गई — वही लड़की, जो माया जैसी दिख रही थी, लेकिन उसकी आँखों में अब घना अंधेरा था।
"तुम कौन हो?" अथर्व ने पूछा, उसकी आवाज़ में घबराहट थी।
"मैं... मैं माया की बहन हूँ," आकृति ने जवाब दिया, उसकी आवाज़ में दर्द और ग़ुस्सा था। "मुझे मार डाला गया था, लेकिन माया ने मुझे यहाँ बंद कर दिया। मुझे अपनी आत्मा को शांति चाहिए।"
अथर्व अब समझ चुका था कि माया केवल एक पीड़ित आत्मा नहीं थी। वह कुछ और थी, एक खतरनाक शक्ति थी, जिसने अपनी बहन को मार दिया था और उसे इस शीशे में बंद कर दिया था।
"तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँ?" अथर्व ने आगे पूछा।
"हाँ," उसने धीमे से कहा। "लेकिन तुम्हें माया से सामना करना होगा। वह मुझे कभी नहीं जाने देगी।"
अथर्व को अब यह समझ में आ गया था कि माया का राज़ बहुत गहरा था। और जो भी हुआ, वह सिर्फ एक शरारत नहीं, बल्कि एक अंधेरे राज़ था, जिसे उजागर करना अब उसकी जिम्मेदारी बन चुकी थी।
वह जानता था कि उसे माया से सीधे तौर पर सामना करना होगा। वह वापस सीढ़ियों की ओर बढ़ा, लेकिन उसके कदम धीमे और सधे हुए थे, क्योंकि वह जानता था कि माया उसे कहीं न कहीं देख रही होगी।
रात का समय था और बंगले में सब कुछ शांत था, लेकिन तीसरी मंज़िल की ओर बढ़ते हुए, वह महसूस कर रहा था कि कोई उसे घूर रहा है।
जब वह माया के कमरे के पास पहुँचा, तो दरवाज़ा अचानक खुल गया। माया खड़ी थी, और उसकी आँखों में उस भयावह ताकत का एहसास था।
"तुमने उसे आज़ाद करने की कोशिश की?" माया की आवाज़ में गुस्सा था।
"तुम नहीं समझते कि यह सब क्यों हो रहा है।"
अथर्व ने गहरी सांस ली और कहा, "मैं जानता हूँ माया, तुम्हें यह सब रोकना होगा। तुम्हारी बहन को शांति मिलनी चाहिए।"
माया का चेहरा अचानक बदल गया। उसकी आँखें खून से लाल हो गईं, और उसका चेहरा भयावह हो उठा।
"तुम नहीं जानती, तुम नहीं समझते कि जब कोई आत्मा जागती है, तो उससे टकराने की हिम्मत किसी की नहीं होती!" माया ने चिल्लाया।
वह अचानक भूतिया रूप में बदल गई, और कमरे में अंधेरा छा गया।
अथर्व का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। माया का रूप अब पूरी तरह से बदल चुका था। उसके चेहरे पर कोई मानवता नहीं थी, बस एक अजीब सी शैतानी ऊर्जा थी जो उसकी आँखों से बाहर निकल रही थी। कमरे में अंधेरा घना हो गया था और हवा में एक भारी सी गूंज थी।
"तुमने बहुत गलती की है, अथर्व!" माया की आवाज़ अब डरावनी हो चुकी थी। "तुम मेरी शक्ति को नहीं समझते।"
अथर्व ने ठान लिया था कि उसे इस अंधेरे से लड़ना होगा, चाहे जो हो। उसकी आँखों में अब डर नहीं था, केवल संकल्प था। उसने धीरे-धीरे अपना हाथ सामने बढ़ाया और कहा, "मैं तुम्हें तुम्हारी बहन के पास पहुँचाने आया हूँ, माया। तुमसे यह सब खत्म करना होगा।"
माया ने हंसते हुए कहा, "तुमने सोच लिया कि तुम मुझे हरा सकते हो? तुम मेरी शक्ति से मुकाबला नहीं कर सकते।"
अथर्व ने बिना किसी डर के कदम आगे बढ़ाए और कहा, "मैं तुमसे लड़ने नहीं, तुम्हें मुक्ति दिलाने आया हूँ।" उसने शीशे की ओर इशारा किया और बोला, "तुम्हारी बहन के लिए, तुम्हारे लिए, यह सब खत्म करना होगा।"
अचानक, माया के चेहरे पर कुछ बदलने लगा। उसकी आंखों में एक हल्की सी घबराहट दिखाई दी। "तुम नहीं समझते, अथर्व," वह कांपते हुए बोली, "मैं बंधी हुई हूँ, और मुझे अब शांति नहीं मिल सकती।"
अथर्व ने बिना डर के कहा, "तुम्हारी आत्मा को शांति तभी मिल सकती है, जब तुम अपनी गलती स्वीकार करोगी और मुझे तुम्हारी बहन को आज़ाद करने देना होगा।"
वह कुछ पल के लिए चुप रही, फिर उसकी आँखों में एक धीमा बदलाव आया। माया ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और धीरे से कहा, "मुझे खेद है।" और फिर, एक भयानक चीख के साथ, वह अंधेरे में गायब हो गई।
अथर्व ने धीरे से कदम बढ़ाए और शीशे के पास पहुँचा। अब शीशा शांत था, और उसमें कोई भी खतरनाक ऊर्जा नहीं थी। उसे ऐसा लगा कि जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।
तभी, अचानक एक हल्की सी रोशनी दिखाई दी, और माया की बहन की आत्मा सामने आई। उसकी आँखों में शांति थी, और वह मुस्कुरा रही थी। "तुमने मुझे आज़ाद किया, अथर्व। धन्यवाद।"
अथर्व ने धीरे से सिर झुका लिया। "यह सब तुम्हारे लिए था," उसने कहा।
"अब तुम शांति से जा सकती हो।"
अंततः, माया की बहन की आत्मा धीरे-धीरे गायब हो गई, और कमरे में एक अजीब सा सुकून फैल गया। वह जो भी था, अब खत्म हो चुका था।
अथर्व ने एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि उसने एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी की थी। माया की आत्मा को मुक्ति मिल चुकी थी, और अब वह अपनी बहन के पास जा सकती थी।
अथर्व वापस बाहर निकला, और बंगले के दरवाज़े को धीरे से बंद कर दिया।
वह अब घर लौटने के लिए तैयार था, लेकिन उसे यह अहसास था कि जीवन के इस अनुभव ने उसे हमेशा के लिए बदल दिया था। अब वह जानता था कि कभी-कभी अंधेरे से लड़कर ही शांति मिलती है, और असली साहस तब दिखाई देता है, जब हम अपनी सबसे बड़ी डर से भी सामना करने की हिम्मत रखते हैं।