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von Akash Paridaरात के साढ़े बारह बजे थे। पुराने दिल्ली के उस अपार्टमेंट की चौथी मंज़िल पर बस एक ही खिड़की में रोशनी थी — सीमा के कमरे की। बाकी मंज़िल अंधेरे में डूबी हुई थी। बाहर ठंडी हवा चल रही थी, और गलियारे की ट्यूबलाइट हर कुछ सेकंड में टिमटिमा रही थी, जैसे किसी की सांस फूटी हो।
सीमा देर रात तक काम कर रही थी। लैपटॉप की नीली स्क्रीन उसके चेहरे पर हल्की चमक डाल रही थी। तभी दरवाज़े पर धीमी सी दस्तक हुई।
टिक... टिक... तीन बार।
वो जड़ हो गई। अपार्टमेंट में उस समय कोई नहीं था। सामने वाले फ्लैट में रहने वाली बूढ़ी औरत अस्पताल में भर्ती थी, और नीचे के सारे किराएदार अपने गाँव जा चुके थे।
उसे याद आया — शाम को वही बूढ़ी औरत जाते-जाते बोली थी, “रात में अगर कोई भी बुलाए, चाहे नाम लेकर ही क्यों न पुकारे… दरवाज़ा मत खोलना।”
तब सीमा ने हँसकर कहा था, “आंटी, यहाँ कौन बुलाएगा?”
लेकिन अब वही बात दिमाग में गूंज रही थी, जैसे किसी ने दीवारों पर लिख दी हो।
फिर से दस्तक हुई।
थोड़ी ज़्यादा तेज़।
और इस बार, एक आवाज़ —
“सीमा…”
वो आवाज़ बहुत जानी-पहचानी थी। जैसे उसकी कॉलेज की दोस्त रिया।
पर रिया तो दो दिन पहले ही मुंबई निकल गई थी।
सीमा झरोखे के पास गई। बाहर देखा — गलियारा बिल्कुल खाली था। बस ट्यूबलाइट के नीचे रखी प्लास्टिक की बाल्टी धीरे-धीरे हिल रही थी। कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने खिड़की बंद कर दी, पर अंदर घुटन बढ़ गई। उसे लगा जैसे कमरे की हवा भारी हो गई हो।
अचानक मोबाइल की स्क्रीन चमकी — कोई नेटवर्क नहीं। WiFi अपने आप ऑफ़।
दस्तक तीसरी बार हुई। इस बार इतनी नज़दीक कि दरवाज़े की लकड़ी काँप गई।
“सीमा, मैं हूँ…”
वो आवाज़ दरवाज़े के ठीक पीछे से आई थी।
वो धीरे से आगे बढ़ी, कान लगाया —
साँस लेने जैसी आवाज़ थी, लेकिन उलटी दिशा में। जैसे कोई बाहर नहीं, अंदर की हवा खींच रहा हो।
फिर कुंडी अपने आप थोड़ी सी घूमी।
सीमा ने पूरी ताकत से दरवाज़ा दबा दिया। लकड़ी के नीचे से कुछ काला गाढ़ा तरल बहने लगा, जैसे पानी नहीं, परछाईं टपक रही हो।
वो पीछे हट गई, सांसें तेज़, दिल धड़कता हुआ।
लाइट अचानक चली गई। कमरे में घुप अंधेरा।
केवल खिड़की से आती सड़क की पीली रोशनी में उसकी परछाई दीवार पर झूल रही थी।
ट्यूबलाइट झपकी और जली — लेकिन अब दीवार पर दो परछाइयाँ थीं।
एक उसकी, और दूसरी — ठीक उसके पीछे खड़ी किसी और की।
सीमा पलटी — कोई नहीं।
पर कमरे में गीले बालों की गंध फैल चुकी थी।
लैपटॉप अपने आप ऑन हुआ। स्क्रीन पर कैमरा चालू था, और उस फ्रेम में सीमा दिख रही थी — अकेली नहीं।
उसके पीछे दरवाज़े के पास एक लड़की खड़ी थी, चेहरा धुंध में ढका हुआ।
सीमा ने स्क्रीन की तरफ देखा —
वो वही रिया थी।
पर चेहरा सड़ा हुआ, आँखें बिल्कुल सफेद, और होंठों से एक ही शब्द — “खोल…”
सीमा ने चीखने की कोशिश की पर आवाज़ नहीं निकली।
स्क्रीन ब्लिंक हुई और काली पड़ गई।
अब बस कमरे में वो खर्र-खर्र की आवाज़ थी, जैसे कोई फर्श पर नाखून घसीट रहा हो।
सुबह जब चौकीदार ने चौथी मंज़िल का दरवाज़ा खुला देखा, तो अंदर कुछ भी नहीं था —
बस कोने में वही बाल्टी, आधी भरी हुई गंदे, काले पानी से।
और दीवार पर किसी ने खुरच कर लिखा था —
“मैंने कहा था… दरवाज़ा मत खोलना।”
कहते हैं, उस मंज़िल की हर रात 12:33 पर अब भी दस्तक होती है।
कभी किसी के नाम से, कभी किसी की आवाज़ से।
और जो भी जवाब देता है… उसका कमरा अगली सुबह हमेशा खाली मिलता है।