Osho
от M ya0:00) हमारे सोचने का ढंग, हमारे जीवन जीने की पद्धती में (0:06) कोई बुन्यादी खामिया होंगी। (0:09) अन्यथा ये कैसे हो सकता है। (0:11) एक फकीर था जपान में, (0:14) 1930 में वहाँ ये गटना गटी, (0:19) आधिरात को अपने जोपने में कुछ पत्र लिक्रा था। (0:24) किसी आदमे ने द्वार को धक्का दिया, (0:27) द्वार अटका हुआ था, खुल गया। (0:30) जो आदमे भीतर आया, उसने से सोचा होगा कि फकीर सोया हुआ है, (0:34) लेकिन फकीर जगा था, आधिरात थी। (0:37) वो चोर था जो आया था, वो गबडा गया। (0:40) उसने जल्दी से अपना छुरा बाहर निकाल लिया। (0:43) उस फकीर ने कहा कि मित्र छुरे को बंद ही रखो, (0:49) यहां कोई बुरे लोग नहीं रहते हैं कि छुरा निकालने की जुरूत पड़े, (0:52) छुरे को बंद ही रखो, राओ। (0:56) किसे इतनी रात को आना हुआ। (0:59) और छूर बहुत गबडा गया। (1:02) उसने कहा, आप पूछते हैं तो मैं कहदूं, (1:05) मैं तो छूर हूं और छूरी करने के विचार से आया। (1:11) उस फकीर की आँखों में आँसु आ गये। (1:14) उस छूर ने पूछा, क्या हुआ, आप रोते क्यों हैं। (1:17) उस फकीर में कहा, इसलिए रोता हूं, (1:19) कि तुम कितनी पीडा में और दुख में नहीं हो गए, (1:22) कि तुम छूरी करने को तयार हुए। (1:25) और तुम कितनी मजबूरी में नहीं हो गए, (1:28) कि आदि रात को, गाऊं को छोड़ कर एक फकीर के जोपडे में चोरी करने आये। (1:56) जब वो जाने को हुआ, तो उस फकीर ने कहा, किरपा करो, (2:00) कम सकम एक रुपया वापिस छोड़ दो, सुबह मुझे जरुवत पढ़ सकती है। (2:05) उसने एक रुपया छोड़ा आओ, वो छोर बाहर निकला, (2:08) बाहर निकलते वक्त, फकीर ने फिर उससे कहा, एक काम और करो, (2:12) कम सकम मुझे धन्यवाद तो देते जाओ। (2:17) उस छोर ने गब्राहत में धन्यवाद दिया और चला गया, वर्स पर बाद वो पकड़ गया। (2:22) अदालत में मुकदमा था, और भी बहुत छोरियां थी, (2:25) इस छोरी का भी अदालत को पता चल गया, तो उस फकीर को अदालत में जाना पड़ा। (2:31) छोर गब्राहा हुआ था, और सारे लोगों की गवाहियों का उतना मुल्य नहीं था, (2:36) लेकिन अगर फकीर कह देगा कि यह छोरी करने आया, उस फकीर की बड़ी प्रतिष्ठा थी, सेक्रों लोग उसको पूछते थे, उसकी बात को तो कोई गलत नहीं मानेगा, वह बहुत डरा हुआ था. (2:47) फकीर आदालत में गया, मजिस्टेट ने पूछा कि क्या इस आदमी को आप कहचानते हैं, उस फकीर ने कहा बहुत बली भात ही, यह तो मेरे पुराने परची थे और मित्र है, छोर घब्डाया, मजिस्टेट ने पूछा कि क्या इनोंने कभी आपके हाँ चोरी की, � (3:05) उस फकीर ने कहा कि नहीं, इनोंने कभी मेरे हाँ चोरी नहीं की, (3:10) हाँ, एक बार मजबुरी में यह रात को मेरे घर आये थे, (3:13) तो मैंने इनको कुछ रुपे दिये थे और उनके बदले में उन्होंने धन्यवाद दे दिया था, (3:17) बात वहीं समाप्त हो गई थी, चोरी का कोई सबाल नहीं है, (3:24) चोर तो बहुत हरां हुआ, (3:26) बाद में जब वो छूट गया, तो उस फकीर के पास गया और उसमें कहा मैं बहुत हरां हूँ, (3:31) एक चोर को भी आप चोर ना समझ पाए, (3:35) उस फकीर ने क्या कहा? (3:36) उस फकीर ने कहा, जिस दिन मेरे भीतर का चोर मर गया, उस दिन के बाद किसी को चोर समझना मुश्किल हो गया है, (3:47) हमारे विक्तित्व में, जो नहीं है, वो हमें ये सारी दुनिया नहीं दे सकती, (3:59) और जो हमारे विक्तित्व में है, उसे सारी दुनिया की दाकत हमसे छीन भी नहीं सकती,